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पानी की बेरंगी काया पर संकट का काला साया

Fri, 22 Mar 2013 05:30 AM IST
Lucknow
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लखनऊ। कहने को तो पानी का कोई रंग नहीं होता, मगर पिछले तीन साल से राजधानी में पानी अपना बेरंग स्वरूप दिखा रहा है। शहर के अनेक ऐसे इलाके हैं, जहां लगातार गिरता जलस्तर खतरनाक होता जा रहा है। बावजूद, इसे बचाने के लिए अब तक कोई गंभीरता नहीं दिख रही। न तो सरकारी स्तर पर और न ही आम आदमी की ओर से। वैसे तो आपूर्ति ही बहुत कम होती जा रही है, मगर उसमें से भी 30 फीसदी व्यर्थ ही बह जाता है। इससे हालात और भी गंभीर होते जा रहे हैं। वर्षा जलसंचय के इंतजाम आधे-अधूरे हैं। पानी के दोहन पर रोक न लगाए जाने से हालात और भी गंभीर होते जा रहे हैं। जिनकी उम्र 35 साल है वो अपना बचपन याद करें तब पुराने शहर में पूरे दिन पानी की सप्लाई हुआ करती थी। प्रेशर का आलम यह था कि, दोपहर में तो दूसरी मंजिल पर बिना मोटर के ही पानी चढ़ जाता था। मगर अब उन्हीं इलाकों में 24 घंटे में से मात्र 2 घंटे भी पानी लोगों को नसीब नहीं है। गर्मी में तो पुराने शहर ही नहीं ट्रांस गोमती के अलीगंज जैसे पॉश इलाकों में दो से तीन दिन तक आपूर्ति न होना मामूली बात हो जाती है। लखनऊ में जलापूर्ति की बिगड़ती स्थिति को लेकर कई महत्वपूर्ण तथ्य जिम्मेदार हैं, जिसमें सरकारी लापरवाही के साथ आम लोगों की उदासीनता दोनों बराबर जिम्मेदार हैं।
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लगातार दोहन पर कोई रोक नहीं ः कमाई के लिए धरती की कोख सुखाने वालों के लिए जल कल विभाग के पास कोई भी फार्मूला नहीं है। कार वाशिंग, वर्कशॉप, होटल, बड़ी-छोटी ग्रुप हाउसिंग और शापिंग मॉल में लगाए गए सबमर्सिबल को लेकर कोई भी रोक और कर की व्यवस्था नहीं की जा रही है जबकि वास्तविकता में राजधानी के घटते जलस्तर के लिए यही जिम्मेदार हैं। इन सारे पानी के शाहखर्चों की मौज ही मौज है मगर इन पर किसी का कोई जोर नहीं चल रहा है। जल संस्थान के पास इन लोगों को जलकर के दायरे में लाने का कोई प्रावधान नहीं है। पहले कई बार इस संबंध में प्रस्ताव लाने की बात कही गई मगर इस तरह का कोई निर्णय कभी नहीं लिया जा सका। शहर में हजारों की संख्या में कार वाशिंग सेंटर, होटल, अपार्टमेंट और शॉपिंग मॉल हैं। इनमें पानी के कॉमर्शियल कनेक्शन लिए गए हैं, मगर ये कनेक्शन बस दिखावा भर हैं। कॉमर्शियल कनेक्शन वाटर मीटर से जुड़े होते हैं मगर वास्तविक खर्च सबमर्सिबल के जरिये किया जाता है। दिन रात धरती से खींच कर पानी लिया जाता है। मगर न तो रिचार्जिंग का कोई खास इंतजाम किया जाता है और न ही इसका कोई बिल जमा होता है। नगर निगम अपने आगामी सदन में जल कर में तीन गुनी तक बढ़ोतरी करने जा रहा है। इसका सीधा असर महंगाई झेल रहे आम आदमी पर पड़ेगा। मगर भूगर्भ जल के जरिये अपनी जेब गर्म करने वाले लोगों पर इसका कोई असर नहीं होगा। वे रोज जमीन के अंदर से लाखों लीटर पानी बिना रोक-टोक खींच रहे हैं।

यहां घट रहा है तेजी से जल स्तर
गोमती नगर--- 1.69 मीटर प्रति वर्ष
विकास नगर-- 1.13 मीटर प्रति वर्ष
इंदिरा नगर--- 1.10 मीटर प्रति वर्ष
हजरतगंज-नरही - -1.69 मीटर प्रति वर्ष
कैंट---------- 1.01 मीटर प्रति वर्ष
200 फीट की गहराई पर मिल रहा पानी ः लखनऊ। शहर का जल स्तर तेजी से नीचे गिर रहा है। राजधानी के नए इलाकों में पानी का लेवल पिछले तीन साल में 30 फीट तक पानी नीचे चला गया है। पानी के अंधाधुंध दोहन की वजह से हालात बिगड़ते जा रहे हैं। शहर में सैकड़ों हैंडपंप खराब हैं और दर्जनों नलकूप सूखे हैं। धरती की कोख खाली हो रही है। सेमीनार और वर्कशॉप के नाम पर हर साल लाखों रुपये राजधानी में फुंके जा रहे हैं जबकि दोहन को लेकर सख्त कानून न होने और बनाए गए नियमों का पालन न करने से धरती का पानी इंच-दर-इंच नीचे जा रहा है। करीब चार साल पहले 130 फीट पर निर्बाध पानी मिलता था, अब इसी गहराई पर बोरिंग करने पर कुछ ही दिनों में हैंडपंप सूख जाते हैं। हैंडपंपों के लिए 180 से 200 फीट तक बोरिंग करवानी पड़ रही है। ऐसे ही हालात नलकूपों के भी हैं। भूगर्भ जल स्तर घट रहा है। शहर में करीब 250 हैंडपंप खराब हो गए और दर्जनों नलकूप सूख गए हैं।
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पानी में नाइट्रेट एक बड़ी समस्या ः राजधानी के पानी में हार्डनेस बहुत है। इस वजह से अधिकतर हैंडपंपों का पानी खारा है और उसको पीने के लिए पूरी तरह से शुद्ध नहीं कहा जा सकता है। नाइट्रेट भी कई जगह पाया गया है। नाइट्रेट की अधिकता पानी में सीवरेज के मिलने से हो जाती है जबकि पानी में आर्सेनिक जैसे खतरनाक तत्वों के होने की भी आशंका है। इसके बावजूद इस संबंध में कुछ खास शोध नहीं किए जा रहे हैं।
रेन वाटर हार्वेस्टिंग नाममात्र ः एलडीए की ओर से नए बन रहे भवनों के लिए रेन वाटर हार्वेस्टिंग का इंतजाम किया जाना जरूरी है। इस संबंध में कोई कड़ा नियम न होने की वजह से पुराने बने भवन हार्वेस्टिंग के लिए कुछ भी नहीं कर रहे हैं जबकि नए भवन मालिक भी इसमें आंख चुराने की कोशिश कर रहे हैं।
यहां घट रहा जल स्तर
- सआदतगंज
- विकास नगर
- अलीगंज
- जानकीपुरम
- खदरा
- कैंट
पानी को लेकर कुछ खास आंकड़े
- राजधानी की आबादी करीब 40 लाख
- प्रति व्यक्ति 150 लीटर के हिसाब से प्रतिदिन की जरूरत 4500 एमएलडी
- प्रति व्यक्ति 20 लीटर के हिसाब से प्रतिदिन की उपलब्धता 500 एमएलडी
- अनुमान के मुताबिक रोजाना करीब 30 फीसदी पानी बेवजह बर्बाद होता है।
- 90 फीसदी बड़ी इमारतों में रेन वाटर हार्वेस्टिंग का इंतजाम नहीं है।
- विभिन्न क्षेत्रों में कम से कम एक मीटर नीचे हर वर्ष जा रहा भूगर्भ जल स्तर।
- ऐशबाग, बालाघाट और कठौता में तीन वाटर वर्क्स।
- धरती की कोख सुखा कमाने वालों की मौज ही मौज
- हर साल जल कर भरने वालों पर फिर बढ़ेगा तिगुना बोझ
- कार वॉश, वर्कशॉप, अपार्टमेंट में सबमर्सिबल पर कर नहीं
- अंधाधुंध भूगर्भ दोहन से राजधानी में बिगड़ते जा रहे हालात

केवल 13 सरकारी भवनों में रेनवाटर हार्वेस्टिंग ः राजधानी के मात्र 13 सरकारी भवनों में वर्षा जल संचय के लिए संयंत्र लगाए गए हैं। इनमें से एक-दो को छोड़ कर सभी महकमों के दफ्तर गोमती नगर में हैं जबकि शहर के किसी भी सरकारी प्रतिष्ठान ने शासनादेश के बावजूद हावेस्टिंग प्लांट नहीं लगाया है। राजधानी में करीब डेढ़ हजार सरकारी भवन हैं, जहां वर्षा जल संचयन किया जाना जरूरी है। निजी भवनों को हर सप्ताह रेन वाटर हार्वेस्टिंग के सैकड़ों नोटिस भेजने वाले लखनऊ विकास प्राधिकरण का जोर सरकारी विभागों पर नहीं चल रहा है।
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1 . आरबीआई, गोमती नगर
2 . मानवाधिकार आयोग, गोमती नगर
3 . इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान, गोमती नगर
4 . समाज कल्याण निर्माण निगम, गोमती नगर
5 . इंदिरा भवन, अशोक मार्ग
6 . विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद, महात्मा गांधी मार्ग
7 . कैसरबाग बस अड्डा
8 . सीएसजेएम मेडिकल यूनिवर्सिटी
9 . इंदिरा गांधी नक्षत्र शाला, डालीगंज
10 . लखनऊ ट्रेनिंग सेंटर पंचायती राज अलीगंज
11 . डॉ. राममनोहर लोहिया इंस्टीट्यूट, गोमती नगर
12 . मिनी स्टेडियम, विजयंत खंड गोमती नगर
13 . लखनऊ विकास प्राधिकरण, गोमती नगर
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इनमें नहीं जल संचय संयंत्र
नगर निगम
चारबाग
डीजीपी ऑफिस
शक्ति भवन
बापू भवन
शास्त्री भवन
जवाहर भवन
इनकम टैक्स
पासपोर्ट ऑफिस
चारबाग रेलवे स्टेशन
200 सरकारी शैक्षणिक संस्थान
पुलिस विभाग के दफ्तर
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