लखनऊ। बेकार प्लास्टिक का कचरा लखनऊ की सड़कों को पक्का करने में उपयोगी साबित हो सकता है। राजधानी में हर साल निकल रहा करीब 28 हजार टन प्लास्टिक के कचरे को संशोधित कर कोलतार के साथ उपयोग किया जा सकता है। यह प्रक्रिया न सिर्फ कम खर्चीली है बल्कि इससे सड़कों को मजबूती भी मिलेगी। यह सुझाव शनिवार को सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ प्लास्टिक्स इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी में चल रही अंतरराष्ट्रीय सेमिनार एडवांसमेंट्स इन पॉलिमेरिक मैटीरियल (एपीएम) में विशेषज्ञों ने दी। सेमिनार का दूसरा दिन प्लास्टिक की रिसाइकिलिंग पर केंद्रित रहा। स्विनर्बन यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी, ऑस्ट्रेलिया मेलबर्न के इगोर बारस्की ने कहा कि एक ओर प्लास्टिक का उपयोग बढ़ा है तो दूसरी तरफ बीते एक दशक में दुनियाभर से प्लास्टिक को रिसाइकल करने की प्रक्रिया धीमी हुई है। उन्होंने बेकार हो चुके प्लास्टिक को रिसाइकिल कर एक सस्ता और आसानी से उपलब्ध होने वाला तत्व ‘पॉलीथिलीन टेेरेप्थलेट’ (पीईटी) बनाने की बात कही। इगोर ने बताया कि इस्तेमाल की जा चुकी प्लास्टिक की कोल्ड ड्रिंक और अन्य पेय पदार्थों की बोतल, डिटर्जेंट व कॉस्मेटिक्स की पैकेजिंग आदि से निकले प्लास्टिक वेस्ट का ऑस्ट्रेलिया में पीईटी बनाने में 95 प्रतिशत उपयोग हो रहा है। ये क्वालिटी में इतना अच्छा है कि इनका उपयोग नई बोतलें बनाने से लेकर जानवरों का चारा सुरक्षित रखने तक में उपयोग हो रहा है। सीपैट के तकनीकी विभाग के मुख्य प्रबंधक एस सुगुमार ने प्लास्टिक के कचरे को प्लास्टिक बिटुमिन बनाने की जानकारी दी। इससे बनी सड़कें न केवल कम खर्चीली होगी बल्कि मजबूत भी ज्यादा होगी। उन्होंने बताया कि आमतौर पर सड़कें बनाने में कच्चे तेल से विभिन्न उत्पाद बनाने के बाद निकला कोलतार काम आता है, लेकिन पानी की अधिकता वाले स्थानों पर यह कमजोर साबित हुआ है। इसमें मिश्रण के लिए प्लास्टिक बिटुमिन उपयोगी साबित हुआ है। भारत के केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड प्लास्टिक बिटुमिन के उपयोग को हरी झंडी दे चुका है और दिल्ली, मुंबई, पुणे में कई रोड इससे बनाई जा रही है। वहीं, अपने व्याख्यान में उन्हाेंने बताया कि देश में 55 हजार प्लास्टिक प्रोसेसिंग इकाइयां हैं, लेकिन सिर्फ 4 हजार इकाइयां ही रिसाइकिलिंग पर काम कर रही हैं जबकि प्लास्टिक ऐसा तत्व है, जिसका बड़े स्तर पर रीसाइकिलिंग कर उपयोग किया जा सकता है।
चार साल में देश में दोगुना प्लास्टिक ः एस सुगुमार के अनुसार देश में बीते वित्त वर्ष में 80 लाख टन प्लास्टिक का उपयोग हुआ था, जिसमें से अधिकतम भाग कुछ ही दिनों में कचरे में बदल गया। दूसरी ओर 2017 तक यह डेढ़ करोड़ टन पर पहुंच जाएगा। इससे तैयार कचरे का सही प्रबंधन और दुबारा उपयोगी बनाना एक बड़ी चुनौती बन सकता है। हालांकि यह बहुत उपयोगी है। वहीं इगोर के अनुसार इलेक्ट्रिकल और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के वेस्ट की रिसाइकिलिंग नए और ज्यादा मजबूत प्लास्टिक का निर्माण किया जा सकता है।