लखनऊ। वाणिज्य कर विभाग का एक नायब तहसीलदार स्थानांतरित हो गया। उसे लास्ट पेमेंट सर्टिफिकेट (एलपीसी) जारी हो चुका था, लेकिन नायब तहसीलदार की पगार ट्रेजरी से निकलती रही। जब तक इस खेल पर दूसरे कर्मियों की नजर पड़ी तब तक करीब 23 लाख रुपए की हेराफेरी हो चुकी थी। लखनऊ जोन दफ्तर में हुए इस वेतन घोटाले के आरोपी को निलंबित कर दिया गया है। इसके बावजूद अक्तूबर 2012 में उजागर हुए इस घोटाले में कुल कितने रुपए की चपत लगी, इसका पता नहीं लग सका है।
वाणिज्य कर मुख्यालय के अनुसार मीराबाई मार्ग स्थित जोनल एडिशनल कमिश्नर दफ्तर में तैनात नायब तहसीलदार गुलाब चंद का मार्च 2012 में उसके मूल विभाग राजस्व विभाग (लखनऊ) में तबादला हो गया था। वह मार्च में ही कार्यमुक्त होकर चले गए। लखनऊ जोन दफ्तर से उनकी सर्विस बुक और जीपीएफ पासबुक तबादले वाली नई जगह पर भेज दी गई। इसके बाद भी नायब तहसीलदार की अप्रैल से हर महीने की पगार ट्रेजरी से निकलती रही। अक्तूबर 2012 में एक लेखाकार की नजर इस खेल पर पड़ी तो बात अफसरों तक पहुंची। जांच में नायब तहसीलदार के साथ ही एक अन्य स्थानांतरित कर्मचारी की पगार ट्रेजरी से निकालने का खुलासा हुआ। अफसरों ने वेतन बनाने वाले कर्मचारी राजेश कुमार श्रीवास्तव पर शिकंजा कसा तो उसने खुद ही साल 2004 से अब तक करीब 23 लाख रुपए की हेराफेरी पकड़कर अधिकारियों को अवगत कराया और उक्त रकम सरकारी खाते में जमा कर दी। इस पर अफसरों ने राजेश कुमार श्रीवास्तव के सिर वेतन घोटाले का ठीकरा फोड़ते हुए उसे नवंबर 2012 में निलंबित कर स्पेशल ऑडिट कराने के लिए आयुक्त को पत्र भेज दिया।
मॉडस अपरेंडीः एक वाणिज्य कर अफसर के अनुसार आरोपी कर्मचारी ने वेतन हड़पने के लिए खास मॉडस अपरेंडी को अपनाया। कर्मचारी अन्य अधिकारियों एवं कर्मियों की पगार के साथ ही स्थानांतरित नायब तहसीलदार की पगार ट्रेजरी से पास कराकर कुल राशि का चेक हासिल करता रहा। इसके बाद अधिकारियों एवं कर्मियों की पगार तो उनके सही खाते में जमा करने की एडवाइस भेजता रहा, लेकिन स्थानांतरित नायब तहसीलदार की पगार को एक चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के खाते में जमा कराता और एटीएम से रकम निकाल लेता था।