लखनऊ। डॉ. राम मनोहर लोहिया आयुर्विज्ञान में हुई 22 भर्तियों के मामले में भले ही कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया हो लेकिन किंग जार्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी के भ्रष्टाचारियों पर अभी तक कोई आंच नहीं आई है। पूर्व सरकार में रहे चिकित्सा शिक्षा मंत्री, पूर्व कुलपति और पूर्व रजिस्ट्रार और बाबुओं ने मिलकर सैकड़ों कर्मचारियों की भर्ती कर डाली। अपने रिश्तेदारों को रेवड़ी की तरह नौकरी बांटी लेकिन किसी का बाल भी बांका नहीं हुआ। शासन और सत्ता का सिर पर हाथ होने के कारण कई विधायकों की शिकायतों को भी दबा दिया गया। जनसूचना के अधिकार से जानकारी मांगी गई लेकिन उसे भी नियमों के जाल में उलझा दिया गया। लोहिया आयुर्विज्ञान संस्थान के मामले में कार्रवाई होने के बाद अब एक बार फिर केजीएमयू में हुई गड़बड़ियों की जांच की मांग की जाएगी।
केजीएमयू में पूर्व सरकार के कार्यकाल के दौरान हुई 800 से अधिक भर्तियों की जांच कराने की फिर से मांग की जाएगी। पूर्व रजिस्ट्रार वी.पी. सिंह, कुलपति कार्यालय के बाबू और प्रशासनिक अधिकारी जांच के दायरे में आ सकते हैं। इन लोगों की मिलीभगत से पूर्व चिकित्सा शिक्षा मंत्री के जिले के लोगों और अधिकारियों, डॉक्टरों को रिश्तेदारों को रेवड़ी की तरह नौकरी बांटे जाने की शिकायत शासन से की गई थी लेकिन अभी तक कोई कार्रवाई न होने से पूरे मामले की फिर से उठाने की तैयारी चल रही है। वर्तमान सरकार के एक विधायक से मिलकर इस मामले को फिर से मुख्यमंत्री के सामने रखने की रूपरेखा तय की जारी है। पूर्व में भी इन्हीं विधायक ने गड़बड़ियों की शिकायत की थी लेकिन सत्ता में न होने के कारण इनकी मांग अनसुनी कर दी गई थी। गौरतलब है कि बसपा शासनकाल में आठ सौ से अधिक पदों पर पीआरओ से लेकर चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों की भर्तियां की गई। इन भर्तियों में साले, सालियों, भतीजों, भाइयों और शिक्षकों की पत्नियों को नौकरी रेवड़ी की तरह बांटी गई। अधिकारियों का रिश्तेदार होने के अलावा, विशेष जनपद और विधान सभा क्षेत्र के लोगों को भी तवज्जो दी गई। नियुक्तियों में जमकर नियमों की धज्जियां उड़ाई गईं। इस मामले में तत्कालीन चिकित्सा शिक्षा मंत्री, कुलपति, रजिस्ट्रार और अधिकारियों की इस अंधेरगर्दी की शिकायत कई विधायकों ने की थी। सत्ता पक्ष के ताकतवर मंत्री की संलिप्तता के चलते पूरा मामला दबा दिया गया। सरकार बदलने के बाद केजीएमयू में हुए गड़बड़ घोटाले की परतें उधड़ने की संभावना थी लेकिन फिर से पूरा मामला दब गया। अब इस मामले में फिर से मुख्यमंत्री से शिकायत करने की तैयारी चल रही है।
भर्ती घोटाले के दोषियों पर नहीं हुई कार्रवाई : केजीएमयू में 2005 में हुए भर्ती घोटाले के दोषियों पर कार्रवाई के निर्देश पूर्व मंडलायुक्त दे चुके हैं। सात साल पहले कुलपलि प्रो. महेंद्र भंडारी और रजिस्ट्रार आर.पी. गोस्वामी के कार्यकाल में 275 पदों पर हुई भर्तियों में धांधली के आरोप लगे थे। इस बार भी अधिकारियों और कर्मचारियों के रिश्तेदारों को नौकरी बांटने के आरोप लगे थे। इसके बाद शासन ने पूरे मामले की जांच कराने के निर्देश दिए थे। सात साल बाद आई जांच रिपोर्ट में सेवा योजना कार्यालय को भर्ती की सूचना न देने, चयन समिति के सभी सदस्यों और विशेषज्ञों के हस्ताक्षर सूची में न होने, पदों के अनुपात में आवेदन न होने के बावजूद भर्ती करने सहित कई आरोप साबित हो गए थे। मंडलायुक्त ने इस मामले की जांच के बाद दोषियों पर कड़ी कार्रवाई के निर्देश दिए। इसके बावजूद केजीएमयू प्रशासन ने सभी आरोपियों को बचा लिया।