लखनऊ। शारदीय नवरात्र आश्विन शुक्ल पक्ष के पहले दिन मंगलवार को मां दुर्गा के पहले शैलपुत्री रूप की पूजा की जाएगी। मां के जयकारों के साथ सुबह से ही श्रद्धालु मंदिरों में देवी पूजन को उमड़ेंगे। धूप-अगरबत्ती, फल-फूलों और मंत्रोच्चारों के बीच श्रद्धालु सुख समृद्धि का आशीष मांगेंगे। साथ ही घरों में भी मां की आराधना के लिए कलश स्थापना की जाएगी। ज्योतिषाचार्यों के मुताबिक, मंगलवार को कलश स्थापना का उत्तम मुहूर्त 9:05 बजे के बाद है। इसके बाद अभिजित मुहूर्त में (11:37 से 12:25 बजे तक) भी कलश स्थापना की जा सकती है। नवरात्र से एक दिन पहले सोमवार को बाजारों में भी महिलाएं देर रात तक पूजा-पाठ के सामान की खरीददारी में जुटी रहीं। मंदिरों में भी साज-सज्जा की तैयारियां अंतिम दौर में थीं। महानगर निवासी आचार्य प्रदीप ने बताया कि 15 अक्तूबर की शाम 6:17 बजे के बाद आश्विन शुक्ल पक्ष प्रतिपदा लग गई, लेकिन 16 अक्तूबर को उदया तिथि में प्रतिपदा का मान मिलने से शारदीय नवरात्रि का पहला व्रत 16 अक्तूबर को ही रखा जाएगा। इस दिन घरों और मंदिरों में मां के पहले रूप शैलपुत्री का पूजन-अर्चन होगा। उन्होंने बताया कि 16 अक्तूबर को सुबह 9:05 बजे तक चित्रा नक्षत्र का मान है। शास्त्रों के अनुसार वैधृत योग और चित्रा नक्षत्र में घट स्थापना नहीं करनी चाहिए। अभिजित मुहूर्त में सुबह 11:37 से दोपहर 12:25 बजे के मध्य भी कलश स्थापना की जा सकेगी। इस बार नवरात्र में षष्ठी तिथि का क्षय है। पं. कृष्णकांत के मुताबिक, पहला और आखिरी व्रत रखने वाले लोग मंगलवार 23 अक्तूबर को व्रत रखेंगे।
साज-सजावट अंतिम दौर में ः नवरात्र के एक दिन पहले चौक के बड़ी काली जी मंदिर, छोटी काली जी मंदिर, संतोषी माता मंदिर, मां बाघंबरी देवी मंदिर, संदोहन माता मंदिर, संकटा देवी मंदिर, शास्त्री नगर स्थित दुर्गा माता मंदिर, बांग्ला बाजार के राम जानकी मंदिर, कृष्णानगर राम जानकी मंदिर, भारत माता मंदिर, इंद्रेश्वर मंदिर, त्रिवेणीनगर योगी नगर दुर्गा मंदिर, मदेयगंज दुर्गा मंदिर, चिनहट के मां जानकी मंदिर, कैसरबाग दुर्गा मंदिर, हाथी बाबा वाले मंदिर, समेत डालीगंज, अलीगंज, महानगर, इंदिरानगर, गोमतीनगर के मंदिरों में भी पूजन के लिए साफ-सफाई और तैयारियां जोरों पर रहीं।
घट स्थापना-पूजन विधि ः शारदीय नवरात्र के पहले दिन पूजा स्थल को लीपने के बाद स्वच्छ मिट्टी से वेदी बनानी चाहिए। वेदी में सात प्रकार के अनाज या जौ-गेहूं को बोने के बाद उसमें सामर्थ्य के अनुसार मिट्टी या धातु का कलश स्थापित करे। इसके बाद उसमें देवी प्रतिमा स्थापित करें। घट स्थापना के बाद आम के पल्लव और उनके ऊपर अनाज की कटोरी रखकर दीपक की स्थापना करें। दीपक पर चावल-अक्षत चढ़ाए। पूर्व की ओर मुख कर देशी घी या तेल का दीपक जलाएं। कलश को नैवैद्य-मिष्ठान्न को भोग लगाएं और पुष्प चढ़ा मां के पहले रूप की पूजा-आराधना करें। आरती उतारें और कीर्तन करें।
देवी पूजन ः देवी भक्ति तरंगिणी और देवी पुराण के मुताबिक, दक्षिण मुख की देवी का पूजन शुभ फल देने वाला और पूर्व मुख देवी का पूजन जय प्रदान करने वाला होता है। जबकि पश्चिम मुख देवी का पूजन सदा स्थापन उत्तम रहता है। घट स्थापन के बाद यथाशक्ति नवाक्षर मंत्र ‘ऊं दुर्गे दुर्गे रक्षिणि स्वाहा’ का जप करना चाहिए।
कलश स्थापना का मुहूर्त ः महानगर निवासी आचार्य प्रदीप ने बताया कि शुभ मुहूर्त के अलावा दिन के अभिजित मुहूर्त के मध्य भी कलश स्थापना करना उत्तम रहेगा। इसके अलावा अपनी राशि की पांचवीं, नवीं, ग्यारहवीं राशि में कलश स्थापन किया जा सकता है।