अभ्यास के लिए सही जोड़ीदार की कमी
अनु बताती हैं कि कोरोना के दौर में मुश्किलें आईं। विदेशों में प्रतियोगिताएं कम मिलीं। देश में तो अभ्यास के लिए उन्हें सही जोड़ीदार की कमी महसूस होती है। ओलंपिक में कड़ी चुनौती के बीच उन्हें अपने से बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद है। एशियाई खेलों में कांस्य पदक जीतने वालीं एथलीट ने पिछले माह अंतर राज्य एथलेटिक्स 62.83 मीटर की थ्रो फेंकी लेकिन 64 मीटर के ओलंपिक क्वालिफाइंग मार्क को हासिल नहीं कर सकीं। उन्हें रोड टू टोक्यो में 18वीं रैंकिंग के चलते ओलंपिक में भाग लेने का मौका मिला।
भाई के जूते पहनकर खेलीं
अनु बताती हैं कि शुरुआत में ट्रेनिंग के लिए बड़ी आर्थिक दिक्कतें आईं। भाला खरीदने की तो छोड़ो महंगे स्पोर्ट्स शूज भी नहीं थे। भाई के बड़े जूतों को पहनकर अभ्यास किया जबकि वो फिट भी नहीं आते थे। भाई ने उनकी प्रतिभा को पहचाना। शुरुआत में बांस को भाला बनाकर फेंका था। पिता से प्रोत्साहन मिला तो सपनों को जैसे पंख लग गए। कहती हैं, परिवार का बड़ा योगदान है। मुझे याद है कि जब ट्रेनिंग के खर्चों के लिए पिता ने दोस्तों से कई बार पैसे उधार लिए। तब यह ठान लिया था कि कुछ करके दिखाना है। सबकी मेहनत और संघर्ष बेकार नहीं जाना चाहिए।
गुरमीत के 21 साल बाद अनु :
अनु रानी से पहले महिला भालाफेंक एथलीट के रूप में गुरमीत कौर ने 2000 सिडनी ओलंपिक में हिस्सा लिया था।
ये पदक जीते :
2014 इंच्योन एशियाई खेल, एशियन चैंपियनशिप 2017 भुवनेश्वर कांस्य, 2019 एशियाई चैंपियनशिप रजत पदक, 2016 दक्षेस खेल गुवाहाटी रजत पदक