दरअसल, जब हमारा देश गुलाम था तब दुनिया में भारत की पहचान गांधी, हॉकी और ध्यानचंद की वजह से होती थी। आजाद भारत में हॉकी और ध्यानचंद हमेशा से उपेक्षित रहे। हॉकी और उसके जादूगर पर देश और उसकी सरकार का ध्यान नहीं गया। ध्यानचंद को शायद अपनी उपेक्षा का अंदाजा हो गया था। तभी तो उन्होंने अपने अंतिम साक्षात्कार में कहा था, 'जब मेरा निधन होगा तो पूरा विश्व रो रहा होगा, लेकिन भारत के लोगों की आंखों से मेरे लिए एक आंसू भी नहीं निकलेंगे। मैं अपने देश के लोगों को अच्छी तरह जानता हूं।'
यह वही ध्यानचंद थे जिन्होंने हिटलर का ऑफर यह कहकर ठुकरा दिया था कि मुझे मेरा देश भारत सबसे अच्छा लगता है, मुझे कुछ नहीं चाहिए। हॉकी की जादूगरी को देखते हुए हिटलर ने ध्यानचंद को जर्मनी में सेना में सर्वोच्च पद देने की पेशकश की थी। ध्यानचंद को दुनिया में लगभग 55 देशों के 400 से अधिक पुरस्कार प्राप्त हुए हैं। उनके जन्मदिन को देश में खेल दिवस के रूप में मनाया तो गया। लेकिन एक एक सपना जो अब भी अधूरा है, वो है भारत रत्न का। नाम बदकर केंद्र सरकार ने जरूर उसकी भरपाई की है लेकिन भारत रत्न के हकदार वो तब भी थे और मरणोपरांत भी कहीं न कही लोगों में इस बात की कसक है कि उन्हें भारत रत्न जरूर दिया जाना चाहिए। हालांकि, इसको लेकर पिछले कई वर्षों से अलग किस्म की राजनीति चलती आ रही है।
ध्यानचंद ने 22 साल तक भारत के लिए खेला और 400 अंतरराष्ट्रीय गोल दागे। कहा जाता है कि जब वो खेलते थे, तो मानो गेंद स्टिक पर चिपक जाती थी। हॉलैंड में एक मैच के दौरान चुंबक होने की आशंका में उनकी स्टिक तोड़कर देखी गई थी। जापान में एक मैच के दौरान उनकी स्टिक में गोंद लगे होने की बात भी कही गई थी।