आमतौर पर देखने में यह आता है कि पत्नी अगर किसी और को पसंद करने लगे तो व्यक्ति पत्नी के प्रेमी और पत्नी को नुकसान पहुंचाने की सोचने लगता है। कई मामलों में तो पत्नी की बेवफाई व्यक्ति को गुनाह के दलदल तक पहुंचा देती है।
लेकिन यह एक ऐसे व्यक्ति की कहानी है जिसे पत्नी की बेवफाई ने संयासी बना दिया। यह कहानी सदियों पुरानी है उस समय उज्जैन में राजा भार्तृहरि का शासन था। एक बार इनके दरबार में एक साधु पधारे।
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साधु ने राजा के गुणों से प्रभावित होकर उन्हें एक दिव्य फल भेंट किया। साधु ने कहा कि महाराज आप इस फल को ग्रहण करें इससे आप चिर काल तक युवा बने रहेंगे। राजा अपनी पत्नी से बहुत प्रेम करते थे इसलिए उस फल को अपनी रानी को दे दिया।
लेकिन रानी का हृदय मंत्री पर आसक्त था। रानी ने वह फल चुपचाप मंत्री को दे दिया। लेकिन मंत्री एक दासी को चाहता था। इसलिए उसने दिव्य फल दासी को दे दिया। दासी ने सोचा कि क्यों न यह फल महाराज को दे दिया जाए ताकि वह चिर काल तक युवा रहकर जन समुदाय का कल्याण कर सकें।
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इसलिए दासी वह फल लेकर राजा के पास आई। राजा ने जब फल को देखा तो दासी से प्रश्न किया कि तुम्हें यह फल कैसे प्राप्त हुआ। इसके बाद सारा भेद खुलता चला गया। इस घटना से राजा भार्तृहरि का संसार से मोह भंग हो गया।
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राजा ने अगले ही दिन अपने छोटे भाई विक्रमादित्य का राजतिलक करवा दिया और स्वयं वैरागी बनकर ईश्वर की भक्ति में निकल पड़े।