फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

प्राण और शरीर के मिलन से प्रकट हुए श्री कृष्णः श्री श्री रविशंकर

Tue, 27 Aug 2013 06:15 PM IST
नई दिल्ली/इंटरनेट डेस्क
विज्ञापन
विज्ञापन
कृष्ण पूर्ण आनंद हैं और आनंद की प्रतिमूर्ति हैं। इसीलिए लोग उनकी शिकायतें करने आते लेकिन उन्हें देखते ही गुस्सा गायब हो जाता। शुद्ध प्रसन्नता और आनंद के सामने कोई शिकायत नही ठहरती। आपके जीवन में सब कुछ ठीक हो तो आप खुलकर मुस्कुरा सकते है, जब बुरे दिनों में आप मुस्कुरा पाएं तो ही आप ने जीवन में कुछ उपलब्धि प्राप्त की है।
विज्ञापन


कृष्ण के जीवन में यही गुण था, उनकी मुस्कुराहट सबको मोहित करती थी। कृष्ण को माखन चोर कहा जाता है। अकेले चोर, जिनका पूर्ण सम्मान हुआ है। वे उनका मन भी चुरा लेते है, जिन्होंने प्रेम को पा लिया है; जिनकी चेतना पूर्ण खिल चुकी है। हम उन्हें चितचोर भी कहते हैं जिसका अर्थ है मन को चुराना।

उनका जन्म देवकी यानी शरीर और वासुदेव यानी श्वास के यहां हुआ। जब प्राण के साथ शरीर का समागम होता है तो आनंद का जन्म होता है। इसी लिए कृष्ण को नंदलाल कहा जाता है। नंद या आनंद का अर्थ है प्रसन्नता। कृष्ण के जन्म के समय सभी पहरेदार सो गये थे, ये पहरेदार और कोई नही हमारी पांचों इंद्रियों को कहा गया है। ये इंद्रियां आंतरिक प्रेम और आनंद का अनुभव नहीं होने देती।
विज्ञापन


कृष्ण का मामा कंस हमारा अहंकार है, जिसने हमारे वासुदेव और देवकी को बंधक बना रखा है, जिसके कारण हमारे प्राण और शरीर कैद में है। अहंकार सदैव प्रसन्नता से दूर होता है, यह प्रसन्नता से बैर रखता है। बच्चे सदैव प्रसन्नता से भरे होते हैं, क्योंकि उनमें अहंकार नही होता। कृष्ण को आधी रात में लेकर जाना पड़ा क्योंकि उस आनंद को कंस समाप्त नहीं कर सकता था।

कृष्ण को बचाने के लिए वासुदेव उनको यमुना नदी के पार ले कर गये। पूरे साहस से भरे वासुदेव बाढ़ से उफनती यमुना नदी को पार कर रहे थे। मगर बीच रास्ते में जैसे ही वे डूबने लगे, तभी कृष्ण ने अपना पैर टोकरी से बाहर निकालकर यमुना के उफान को रोका। इसका अर्थ है कि जब भी विपत्ति नाक तक आती है तो ईश्वरीय सहायता सदैव वहां पर रहती है। वह आपकी मदद करती है। कृष्ण ने नियमों को माना लेकिन फिर भी कुछ घटनाएं ऐसी है जहां कृष्ण ने नियम को अनदेखा किया।

एक बार कृष्ण पर एक मणि की चोरी का आरोप लगाया गया। उन्होंने कहा कि वह मणि उनके पास नही है लेकिन किसी ने उन पर विश्वास नही किया। यहां तक कि रुक्मिणी, सत्यभामा और बलराम ने भी भरोसा नही किया। यह देखकर कृष्ण अप्रसन्न हो गये। तब नारद मुनि वहां आए और उन्होंने बताया कि यह आपका मन है जो उत्तेजित हुआ है आप स्वयं नही हुए हो।

स्व तो सभी प्रकार के मन से परे होता है। मन की खिन्नता को देखने पर हम उस खिन्नता से बाहर चले जाते है। इस प्रकार जब भी आप खिन्न हो और यदि आप सोच रहे हों कि ऐसा आपके साथ नही होना चाहिए था, तो उसे तुरंत भगवान को समर्पित कर दें।

साभारः आर्ट ऑफ लिविंग

श्री श्री रविशंकर परिचय
मानवीय मूल्यवादी, शांतिदूत और आर्ट ऑफ लिविंग के संस्थापक श्री श्री रवि शंकर, का जन्म 13 मई 1956 को तमिलनाडु के पापानासम में हुआ था। इनके पिता आरएसवी रत्नम ने इनकी आध्यात्मिक रुचि को देखते हुए इन्हें महर्षि महेश योगी के सान्निध्य में भेज दिया।

महर्षि के अनेकों शिष्यों में से रवि उनके सबसे प्रिय थे। 1982 में रवि शंकर दस दिन के मौन में चले गए। कुछ लोगों का मानना है कि इस दौरान वे परम ज्ञाता हो गए और उन्होंने सुदर्शन क्रिया (श्वास लेने की तकनीक) की खोज की।
विज्ञापन

और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें