धार्मिक मान्यता के अनुसार जिस दिन सोमवार और अमावस्या तिथि हो उसे सोमवती अमावस्या कहते हैं। इस दिन पितरों का तर्पण कर दान पुण्य का विशेष महत्त्व हैं। इस दिन पीपल के पेड़ की पूजा व 108 परिक्रमा करना चाहिए। इस दिन परिक्रमा में पैसा,फल, मिठाई आदि चढ़ानी चाहिए। बच्चो को फल तथा मिठाई बाटने से विशेष फल मिलता हैं। इस व्रत को सुहागिन स्त्रियां अपने पति व पुत्र की दीर्घायु के लिए व अखंड सौभाग्य के लिए करती हैं।
सोमवती अमावस्या की पौराणिक कथा
प्राचीन समय में एक ब्राह्मण था, उसकी एक बेटी थी, जिसकी शादी को लेकर वो बहुत चिंतित रहता था। लड़की बहुत सुंदर, सुशील, कामकाज में अच्छी थी, लेकिन फिर भी उसकी शादी का योग नहीं बन रहा था। एक बार उस ब्राह्मण के घर एक साधू महाराज आये, वे उस लड़की की सेवा से प्रसन्न हुए, और उसे दीर्घायु का आशीर्वाद दिया। फिर उसके पिता ने उन्हें बताया, कि इसकी शादी नहीं हो रही है, साधू ने लड़की का हाथ देखकर कहा, कि इसकी कुंडली में शादी का योग ही नहीं है। ब्राह्मण घबरा कर उपाय पूछने लगा। तब साधू ने सोच-विचार कर के उसे बोला, कि दूर गाँव में एक सोना नाम की औरत है, वह धोबिन है, और सच्ची पतिव्रता पत्नी है। अपनी बेटी को उसकी सेवा के लिए उसके पास भेजो, जब वो औरत अपनी मांग का सिंदूर इस पर लगाएगी, तो तुम्हारी बेटी का जीवन भी सवर जायेगा।
ब्राह्मण ने अगली ही सुबह उसे सोना धोबिन के यहाँ भेज दिया। धोबिन अपने बेटा बहु के साथ रहती थी। ब्राह्मण की बेटी सुबह जल्दी जाकर घर के सारे काम कर आती थी। 2-3 दिन ऐसा चलता रहा। धोबिन को लगा कि उसकी बहु इतनी जल्दी काम कर के फिर सो जाती है, उसने बहू पूछा। तब बहू ने कहा कि, मुझे लगा आप ये काम करते हो। धोबिन ने अगली सुबह उठकर छिपकर देखा, कि ये कौन करता है। तब वहां ब्राह्मण की बेटी आई और फिर उसे धोबिन ने पकड़ लिया। धोबिन के पूछने पर उसने अपनी सारी व्यथा सुना दी। धोबिन भी खुश हो गई और उसे अपनी मांग का सिंदूर लगा दिया। ऐसा करते ही धोबिन के पति ने प्राण त्याग दिए।
ये सोमवती अमावस्या का दिन था। धोबिन तुरंत दौड़ते-दौड़ते पीपल के पेड़ के पास गई। परिक्रमा करने के लिए उसके कोई समान नहीं था, तो उसने ईंट के टुकड़ों से पीपल की 108 बार परिक्रमा की। ऐसा करते ही धोबिन के पति में जान आ गई। इसके बाद से इस दिन का हर विवाहिता के जीवन में विशेष महत्व है, वे अपने पति की लम्बी आयु के लिए व्रत-पूजा सम्पन्न करके यह कथा सुनती हैं। कुछ समय बाद ब्राह्मण की कन्या का अच्छी जगह विवाह हो जाता है, और वह अपने पति के साथ सुखमय जीवन व्यतीत करने लगती है।