हिंदू पंचांग के अनुसार प्रत्येक वर्ष भाद्रपद पूर्णिमा तिथि से पितृ पक्ष प्रारंभ हो जाते हैं, आश्विन अमावस्या तिथि पर समाप्त होते हैं। इस वर्ष 20 सितंबर से पितृपक्ष जिसे श्राद्ध पक्ष भी कहा जाता है, शुरू हो रहा है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पितृ पक्ष के 16 दिनों में हम अपने पितरों को याद करते हैं और उनको पूजते हैं। पितृपक्ष के दौरान हमारे पितर देव स्वर्ग से धरती पर अपने परिजनों से मिलने आते हैं और उन्हें आशीर्वाद देते हैं। पितृ पक्ष के दौरान हमारे जो सगे संबंधी इस पृथ्वी पर जीवित अवस्था नहीं उन्हे याद करते हैं। इन दिनों के दौरान हम पितरों का पिंडदान, तर्पण, श्राद्ध और विशेष पूजा कर्म आदि किए जाते हैं। पितृपक्ष के दौरान पवित्र नदियों में जाकर स्नान करना और पितरों को तर्पण देना, कौए, गाय, ब्राह्राण और श्वान को भोजन दिया जाता है। श्राद्ध पक्ष के दिनों में बिहार के गया में पिंडदान और श्राद्धकर्म करने का विशेष महत्व होता है। इस दौरान गया में बड़ी संख्या में लोग अपने मृत परिजनों का पिंडदान करने के लिए आते हैं। हिंदू धर्म में पितृ पक्ष को लेकर कई तरह की मान्यताएं प्रचलित हैं। ऐसे में आइए जानते हैं पितृ पक्ष से जुड़े तमाम सवालों के जवाब...
पितृ पक्ष क्या है?
हिंदू धर्म में पितृ यानी हमारे पूर्वज जो अब इस दुनिया में जीवित नहीं हैं उनके प्रति आस्था, सम्मान और श्रद्धा व्यक्त करना ही पितृ पक्ष कहलाता है। दिवंगत प्रियजनों की आत्माओं की तृप्ति, मुक्ति और श्रद्धा पूर्वक की गई क्रिया का नाम ही श्राद्ध है। हिंदू पंचांग के अनुसार हर वर्ष भाद्रपद पूर्णिमा तिथि से लेकर अश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या तक का समय पितृ पक्ष या श्राद्ध पक्ष कहलाया जाता है। ऐसी मान्यता है कि पितृ पक्ष के दौरान हमारे पूर्वज जो अब इस दुनिया में नहीं हैं वे अपने परिजनों के पास मुक्ति और भोजन प्राप्त करने के लिए उनसे मिलने आते हैं। इस कारण से पितृपक्ष का विशेष महत्व होता है।
कौन कहलाते हैं पितर
ऐसे व्यक्ति जो इस धरती पर जन्म लेने के बाद जीवित नहीं है उन्हें पितर कहते हैं। ये विवाहित हों या अविवाहित, बच्चा हो या बुजुर्ग, स्त्री हो या पुरुष उनकी मृत्यु हो चुकी है उन्हें पितर कहा जाता है। पितरों की आत्मा की शांति के लिए भाद्रपद महीने के पितृपक्ष में उनको तर्पण दिया जाता है। पितर पक्ष समाप्त होते ही परिजनों को आशीर्वाद देते हुए पितरगण वापस मृत्युलोक चले जाते हैं।
ज्योतिषशास्त्र में पितृ पक्ष
ज्योतिषशास्त्र के नजरिए से अगर देखा जाए तो जब सूर्य कन्या राशि में प्रवेश करते हैं तब ही पितृ पक्ष आरंभ होता है। ज्योतिषीय दृष्टि से इस अवधि में सूर्य कन्या राशि पर गोचर करता है। इसलिए इसे कनागत भी कहते हैं। जिनकी मृत्यु तिथि मालूम नहीं है, उनका श्राद्ध अमावस्या को किया जाता है। इसे सर्वपितृ अमावस या सर्वपितृ श्राद्ध भी कहते हैं। यह एक श्रद्धा पर्व है। इस बहाने अपने पूर्वजों को याद करने का एक रास्ता।
कन्यागते सवितरि पितरौ यान्ति वै सुतान,
अमावस्या दिने प्राप्ते गृहद्वारं समाश्रिता:
श्रद्धाभावे स्वभवनं शापं दत्वा ब्रजन्ति ते॥
पितृ पक्ष में कौए, गाय और कुत्ते को भोजन क्यों दिया जाता है?
पितृ पक्ष के दौरान लोग अपने पूर्वजों को प्रसन्न करने के लिए और उन्हें भोजन से तृप्ति के लिए कौए, गाय और कुत्ते को भोजन दिया जाता है। पितृ पक्ष में यम बलि और श्ववान बलि देने का विधान होता है। यम बलि में कौए को और श्वान बलि कुत्ते को भोजन के रूप में दिया जाता है। कौआ और श्वान दोनों ही यमराज के संदेश वाहक हैं। इसके अलावा गाय में सभी 33 करोड़ देवी-देवताओं का वास होता है इसलिए गाय का महत्व है। वहीं पितर पक्ष में श्वान और कौए पितर का रूप होते हैं इसलिए उन्हें ग्रास देने का विधान है। पितृपक्ष में इनका खास ध्यान रखने की परंपरा है। अन्य मान्यताओं के अनुसार पितृपक्ष में पितरदेव गाय, कौए और श्वान के रूप में अपने प्रियजनों के पास भोजन ग्रहण करने आते हैं। इस कारण से भी इन तीनों का महत्व होता है।
गया में पिंडदान का महत्व
पितरों की आत्मा की शांति के लिए पितृ पक्ष में तर्पण और पिंडदान का सबसे ज्यादा महत्व होता है। पिंडदान और श्राद्ध पूजा के लिए गया की धरती को श्रेष्ठ और शुभ माना गया है। शास्त्रों में गया को विशेष महत्व दिया गया है। गया की भूमि को पांचवां धाम भी कहा जाता है। ऐसी मान्यता है कि गया में पिंडदान और श्राद्ध पूजा करने से पितरों का मुक्ति मिल जाती है। गया भारत के बिहार राज्य में स्थित हैं। भगवान विष्णु ने इसी जगह पर गयासुर नाम के राक्षस का वध किया था जिसके कारण इसका नाम गया पड़ा। ऐसी मान्यता है कि भगवान विष्णु के चरण गया में उपस्थित हैं।
गया जो फल्गु नामक नदी पर स्थित है, त्रेता युग में भगवान राम और सीताजी ने भी राजा दशरथ की आत्मा की शांति के लिए गया में ही पिंडदान किया था। तभी से इस स्थान महत्व है। दूर-दूर से लोग यहां पर आकर पूजा पाठ करते हैं तथा अपने पितरों का पिंडदान करते हैं।
पितृपक्ष के दौरान गया में कर्मकांड का विधि विधान अलग-अलग है। श्रद्धालु एक दिन, तीन दिन, सात दिन, पंद्रह दिन और 17 दिन का कर्मकांड करते हैं। अग्नि जल और अन्न के माध्यम से गया में श्राद्ध पूजा करने पर हमारे पितरों तक पहुँचाकर उन्हें तृप्ति किया जाता है।
पिंडदान के लिए पिंडी चावल से क्यों बनाए जाते हैं
हिंदू धर्म में चावल को बहुत ही शुभ अन्न माना गया है। चावल को अक्षत कहा गया है। चावल में एक विशेषता होती जो कभी खराब नहीं होते। इसके अलावा चावल ठंडी तासीर वाला भोजन है। पितरों को शांति मिले और लंबे समय तक वो इन पिंडों से संतुष्टि पा सकें, इसलिए पिंड चावल के आटे से बनाए जाते हैं।
श्राद्ध की महत्वपूर्ण तिथियां
पंचमी श्राद्ध- जिन पितरों की मृत्यु पंचमी तिथि को हुई हो या अविवाहित स्थिति में हुई है तो उनके लिए पंचमी तिथि का श्राद्ध किया जाता है।
नवमी श्राद्ध - नवमी तिथि को मातृनवमी के नाम से भी जाना जाता है। इस तिथि पर श्राद्ध करने से कुल की सभी दिवंगत महिलाओं का श्राद्ध हो जाता है।
चतुर्दशी श्राद्ध- इस तिथि उन परिजनों का श्राद्ध किया जाता है जिनकी अकाल मृत्यु हुई हो
सर्वपितृ अमावस्या- जिन लोगों के मृत्यु के दिन की सही-सही जानकारी न हो, उनका श्राद्ध अमावस्या को किया जाता है।