विवाह में सप्तपदी का बड़ा महत्व बताया गया है। यह बात से ही साबित हो जाता है कि बदलते दौर में विवाह के कई रीति रिवाज बदल गए या पीछे छूट गए लेकिन सप्तपदी यानी फेरे लेने की परंपरा बनी हुई है।
इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि सप्तपदी के दरम्यान वर और वधू एक दूसरे को वचन देते हैं। इन वचनों पर पति-पत्नी का जीवन भर का साथ जुड़ा रहता है।
शास्त्रों में बताया गया है कन्या के लिए यह पहला वचन
सप्तपदी के दरम्यान कन्या पति को सात वचन देती है इनमें सबसे पहला वचन होता है तीर्थ, व्रतोद्यापन, यज्ञ, दानादि यदि आप मुझे साथ लेकर करें तो मैं आपके वामांग में रहूंगी।
सप्तपदी कन्या का दूसरा वचन
मैं आपके बालक से लेकर वृद्घावस्था तक के सभी कुटुंबीजनों का पालन करूंगी। मुझे निर्वाह में जो मिलेगा उससे संतुष्ट रहूंगी।
सप्तपदी कन्या का तीसरा वचन
मैं प्रतिदिन तुम्हारी आज्ञा का पालन करुंगी और समय पर मीठा अन्न और व्यंजन तैयार करके आपके समक्ष प्रस्तुत करुंगी।
सप्तपदी कन्या का चौथा वचन
मैं स्वच्छतापूर्वक सभी ऋंगारों को धारणकर मन, वाणी और शरीर की क्रिया द्वारा आपके साथ क्रीडा करुंगी।
सप्तपदी कन्या का पांचवा वचन
दुःख में धीरज रखने वाली और सुख में प्रसन्न होने वाली मैं तुम्हारे सुखःदुःख की साथी बनूंगी। मैं कदापि परपरुष का संग नहीं करुंगी।
सप्तपदी कन्या का छठा वचन
मैं आपके सभी काम सुख पूर्वक करुंगी, सास-ससुर की सेवा और दूसरे संबंधियों का सत्कार करुंगी। आप जहां रहेंगे वहां रहूंगी। मैं अपने पति को कभी नहीं ठगूंगी और न उनके द्वारा ठगी जाऊंगी।
सप्तपदी कन्या का सातवां वचन
धर्म, अर्थ और काम संबंधी कार्यों में मैं आपकी इच्छा के ही अधीन रहूंगी। यहां ये अग्निदेव, ब्राह्मण और मेरे माता पिता संबंधियों की मौजूदगी में आप मेरे स्वामी बने हो और मैने यह तन आपको अर्पण किया है।