महाभारत में एक कथा है कि युद्घ में विजय पाने के लिए श्री कृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि भगवान शिव को प्रसन्न करो और उनसे पशुपतास्त्र प्राप्त करो। पशुपतास्त्र मिल जाने से सारे दिव्यास्त्र मिल जाएंगे।
पशुपतास्त्र पाने के लिए अर्जुन तपस्या करने निकल पड़ते हैं। मान्यता है कि अर्जुन ने हिमाचल की किन्नर कैलाश पर्वत पर तपस्या की। उन दिनों इसका नाम इन्द्रकील पर्वत हुआ करता था।
अर्जुन की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव एक भील के रुप में प्रकट हुए। अर्जुन भगवान शिव को पहचान नहीं पाए और इनके बीच युद्घ आरंभ हो गया। लेकिन जल्दी ही अर्जुन को समझ आ गया कि उनसे युद्घ करने वाले स्वयं महादेव हैं।
अर्जुन ने भगवान शिव से हार मान ली और स्तुति करने लगे। इससे खुश होकर शिव अपने वास्तविक रुप में प्रकट हो गए और अर्जुन को पशुपतास्त्र देकर अन्तर्धान हो गए।
किन्नर कैलाश को दूसरा कैलाश भी कहा जाता है क्योंकि इस पर्वत श्रृंखला के सिरे पर करीब साठ फुट ऊंचा पत्थर का शिवलिंग बना है। जिसके दर्शन किन्नौर घाटी और कल्पानगर से किए जा सकते हैं।
इस शिवलिंग की खूबी यह है कि यह दिन में कई बार यह रंग बदलता है। सूर्योदय से पूर्व सफेद होता है, सूर्योदय होने पर पीला, दोपहर में लाल और शाम में काला दिखता है।
मान्यता है कि इस शिवलिंग की स्थापना अज्ञातवास के दौरान पाण्डवों ने की थी।