गुरु मणिभद्र के आदेश पर वह श्रावस्ती के जंगल में जाकर लोगों की हत्याएं करने लगा। यही नहीं आचार्य मणिभद्र के कहने पर ही वह जिनकी हत्याए करता था उनकी उंगलिया काट कर उसको मालाओं में पिरो लेता था, ताकि उगलियां गायब न हो। आचार्य मणिभद्र ने ही उसे अंगुलिमाल का नाम दिया था। उसने गुरु के ही कहने पर 99 लोगों की हत्याएं की थी, लेकिन लूटपाट किसी के साथ नहीं किया था।
इसी बीच भगवान बुद्ध श्रावस्ती में अपना वर्षावाश करने के लिए आए थे। आम लोगों ने उनसे आंगुलिमाल से मुक्ति दिलाने का अनुरोध किया। आम लोगों के अनुरोध पर भगवान बुद्ध श्रावस्ती जंगल की ओर चल दिए जहां उसका आतंक था। वह जंगल में एक अशोक वृक्ष के नीचे बैठ गये। जैसे ही अंगुलिमाल ने तथागत गौतम बुद्ध को देखा उनकी ओर दौड़ा लेकिन वह उन तक पहुंच नही पाया। इस पर अंगुलिमाल ने बुद्ध से कर के रूप में उनसे एक उगली मांगी। यही पर भगवान बुद्ध और अंगुलिमाल के बीच शास्त्रार्थ भी हुआ था। शास्त्रार्थ में हारने व भगवान बुद्ध का चमात्कार देख अंगुलिमाल बौद्ध भिझु बन गया।
अंगुलिमाल ने बुद्ध की स्मृति में श्रावस्ती में एक स्तूप भी बनवाया था। सन् 629 से 645 ई. तक के अपने भारत भ्रमण मे चीनी यात्री हुएनत्सांग ने इस स्तूप को और अन्य स्तूपों को देखा था जो श्रावस्ती में उस समय मौजूद थे।