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संतान की मंगल कामना से जुड़ा है गोवत्स द्वादशी व्रत, गाय-बछड़ों के पूजन से टल जाती है हर विपदा

Fri, 03 Sep 2021 06:51 AM IST
विनोद शुक्ला अनीता जैन ,वास्तुविद

सार

गाय की पूजा के पीछे धार्मिक मान्यता है कि गौमाता के रोम-रोम में देवी-देवता एवं तीर्थों का वास है। सभी वेद भी गाय में प्रतिष्ठित हैं। इसलिए शास्त्रों के अनुसार समस्त देवी-देवताओं और पितरों को प्रसन्न करना हो तो गौसेवा से बढ़कर कोई अनुष्ठान नहीं है।
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गोवत्स द्वादशी का पर्व 4 सितम्बर, शनिवार को मनाया जाएगा।
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विस्तार
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गोवत्स द्वादशी का पर्व 4 सितम्बर, शनिवार को मनाया जाएगा। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन गौमाता की बछड़े सहित पूजा की जाती है। हर मां अपने बच्चों की रक्षा, प्रसन्नता व उन्नति चाहती है। ऐसी ही माताओं का त्योहार है वत्स द्वादशी। गौमाता को समर्पित यह पर्व भाद्र मास में कृष्ण पक्ष की द्वादशी तिथि को मनाया जाता है। कहीं-कहीं इसे बछ बारस भी कहा जाता है। इस दिन बछड़े वाली गाय की पूजा करने के साथ गौरक्षा का संकल्प भी किया जाता है। गऊ माता को हरा चारा, अंकुरित मूंग, मौठ, चने व मीठी रोटी एवं गुड़ आदि श्रद्धा से खिलाया जाता है। गाय की पूजा कर, गाय को स्पर्श करते हुए क्षमा याचना कर परिक्रमा की जाती है। यदि घर के आस-पास गाय व बछड़े नहीं मिलें तो शुद्ध गीली मिट्टी के गाय-बछड़े बनाकर उनकी पूजा करने का भी विधान है।

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ऐसी भी प्रथा है कि इस दिन महिलाएं चाकू से कटा हुआ न तो बनाती है न खाती है। भविष्य पुराण के अनुसार इस व्रत के प्रभाव से व्रती सभी सुखों को भोगते हुए अंत में गौ के शरीर पर जितने भी रौएं हैं, उतने वर्षों तक गौलोक में वास करता है। बछ बारस शुरू होने के पीछे पौराणिक मान्यता यह है कि भगवान श्री कृष्ण के जन्म के बाद माता यशोदा ने इसी दिन गौ माता का दर्शन और पूजन किया था।

गौ सेवा का धार्मिक एवं वैज्ञानिक कारण
गाय की पूजा के पीछे धार्मिक मान्यता है कि गौमाता के रोम-रोम में देवी-देवता एवं तीर्थों का वास है। सभी वेद भी गाय में प्रतिष्ठित हैं। इसलिए शास्त्रों के अनुसार समस्त देवी-देवताओं और पितरों को प्रसन्न करना हो तो गौसेवा से बढ़कर कोई अनुष्ठान नहीं है। गौ माता को श्रद्धापूर्वक भोजन देने से वह सभी देवी-देवताओं तक अपने आप ही पहुँच जाता है। गाय के गोबर में लक्ष्मीजी विराजमान रहती हैं, तभी तो गाय के गोबर से बने उपलों से हवन कुंड की अग्नि जलाई जाती है व गोबर का धुंआ अपने आस-पास के वातावरण को भी शुद्ध कर देता है। इसके धुंए से घर की सकारात्मक ऊर्जा में वृद्धि होती है। गौमूत्र में गंगा मैया का वास माना गया है। इसलिए आयुर्वेद में अनेक बीमारियों के निदान के लिए गौमूत्र पीने की सलाह दी जाती है।
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वैज्ञानिक दृष्टि से भी गोबर को चर्म रोग एवं गौमूत्र को कई रोगों में फायदेमंद बताया है। गाय का दूध, घी उत्तम आहार माने गए हैं। गाय के घी का दीपक जलाने से आस-पास का वातावरण कीटाणुमुक्त हो जाता है। इसलिए गाय को शास्त्रों में कहा गया है-''गायो विश्वस्य मातरः '' यानि गाय विश्व की माता है। नवग्रहों के साथ-साथ वरुण, वायु आदि देवताओं को यज्ञ में दी जाने वाली आहुति गाय के घी से देने की परंपरा है जिससे सूर्य की किरणों को विशेष ऊर्जा मिलती है जो वर्षा का कारण बनती हैं। वैतरणी पार करने के लिए गोदान की परंपरा आज भी हमारे समाज में प्रचलित है। गाय की छाया भी बेहद शुभप्रद मानी गई है। गाय के दर्शन से ही यात्रा शुभ हो जाती है। गाय की सेवा जीवन में सुख -समृद्धि प्रदान कर मानसिक शांति देती है।

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