पंचांग गणना के अनुसार आज कार्तिक शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि है। हिंदू कैलेंडर में नवमी तिथि को बहुत ही महत्वपूर्ण माना जाता है। इस तिथि पर हर वर्ष आंवला नवमी का व्रत रखा जाता है। आंवला नवमी को अक्षय नवमी भी कहा जाता है। आइए जानते हैं आंवल नवमी का महत्व और कथा। अक्षय एक संस्कृत का शब्द है जिसका मतलब कभी क्षय होना। अक्षय शुभ, सौभाग्य और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। अक्षय तिथि पर करने से व्यक्ति को सभी पापों से मुक्ति मिलती है इसके अलावा व्यक्ति को आरोग्यता व सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है। अक्षय नवमी पर पूजा, स्नान और दान करने से सौभाग्य में बढ़ोतरी होती है। इसी कारण से अक्षय नवमी का विशेष महत्व होता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार अक्षय नवमी की तिथि पर ही सतयुग की शुरुआत हुई थी इसी कारण इसे सत्य युगादि के नाम भी जाना जाता है। इसके अलावा अक्षय नवमी की तिथि के दो दिन बाद सृष्टि का पालनहार भगवान विष्णु योगनिद्रा से जागते हैं इस कारण से इसका महत्व अधिक माना जाता है।
आंवला नवमी का महत्व
कई स्थानों पर अक्षय नवमी को आंवला नवमी के नाम से भी जाना है। हर साल कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को आंवला नवमी के रूप में मनाया जाता है। इस बार यह 12 नवंबर को है। मान्यता के अनुसार आंवला नवमी पर आंवले के पेड़ की पूजा की जाती है, क्योंकि ऐसा माना जाता है कि आंवले के पेड़ में सदैव भगवान विष्णु वास करते हैं। आंवला नवमी पर लोग पवित्र नदी में स्नान, ध्यान, दान आदि करके भगवान से हर मनोकामना को पूरी करने के लिए प्रार्थना करते हैं।
स्वास्थ्य के नजरिए से आंवले के फल में पोषक तत्वों का भंडार रहता है। आंवले के नियमित सेवन से शरीर में किसी भी प्रकार की बीमारी जल्दी से प्रवेश नहीं कर पाती है। आंवला के पेड़ में जहां भगवान विष्णु का वास करते हैं वहीं दूसरी तरफ इसकी छाया में भोजन पकाकर खाने और आंवले के सेवन से शरीर व मन दोनों ही ठीक रहता है। इसी कारण से इसे अमला नवमी भी कहते हैं।
आंवला नवमी कथा
कथा के अनुसार, देवी लक्ष्मी पृथ्वी पर निवास करने के दौरान वह भगवान विष्णु और भगवान शिव दोनों की पूजा करना चाहती थीं। लक्ष्मी मां ने बहुत विचार किया कि एक साथ विष्णु और शिव की पूजा कैसे हो सकती है। तुलसी और बेल के गुण एक साथ आंवले के वृक्ष में होते हैं और आंवला वृक्ष भगवान शिव और विष्णु का प्रतीक है। तुलसी भगवान विष्णु को प्रिय है और बेल शिव को। आंवले के वृक्ष को विष्णु और शिव का प्रतीक मानकर मां लक्ष्मी ने आंवले के वृक्ष की पूजा की। पूजा से प्रसन्न होकर विष्णुजी और शिवजी प्रकट हुए। लक्ष्मी माता ने आंवले के वृक्ष के नीचे भोजन बनाकर भगवान विष्णु और शिव को भोजन कराया। इसके बाद स्वयं न भोजन किया। जिस दिन यह घटना हुई उस दिन कार्तिक शुक्ल नवमी थी, तभी से आंवला पूजन की शुरुआत हुई।
आंवला नवमी के 6 उपाय
1. अक्षय नवमी पर आंवले के वृक्ष की करें आराधना क्योंकि आंवले के पेड़ पर भगवान विष्णु, शिवजी और माता लक्ष्मी का वास रहता है।
2. अमला नवमी पर आंवले के पेड़ के नीचे पका कर खाने से भगवान विष्णु का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
3. इस दिन भगवान विष्णु की पूजा करते समय उन्हें भोग में आंवला जरूर चढ़ाएं।
4. इस तिथि पर दान करने का विशेष महत्व होता है। आंवला नवमी के दिन किए गया दान और ब्राह्राणों को भोजन कराने से धन-सम्पदा और सुख-शान्ति में कई गुना बढ़ोत्तरी होती है।
5. आंवला नवमी पर नई चीजों की खरीदारी शुभ मानी जाती है।
6. आंवला नवमी के दिन आंवले का सेवन करना चाहिए। यह औषधीय फल है और धार्मिक दृष्टि से इसका महत्व है।