नित्यास्वामी के बचपन की घटना है। तब उसने भजन-ध्यान शुरू किया ही था। किसी ने कहा कि योग्य गुरु के मार्गदर्शन में साधना करने से जल्दी प्रगति होती है। सो वह गुरु की खोज में निकला।
ऐसे गुरु की खोज में, जो उसे उसकी इच्छाओं और वासनाओं के अनुसार जीने का परामर्श दे। किंतु इसके लिए कोई सिद्ध संन्यासी तैयार नहीं हुआ, क्योंकि गुरु नियमों का पालन करने को कहते, तो नित्या तुरंत कह देता कि ऐसा नहीं हो सकता।
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थक-हारकर वह एक वृक्ष के नीचे बैठकर सोचने लगा, किसी का दास नहीं बनना चाहिए। परमात्मा जैसे प्रेरित करें, वैसे ही करना चाहिए। यह निश्चय करते ही एक ऊंट उसके सामने आकर खड़ा हो गया। नित्या ने सोचा कि इस ऊंट को ही गुरु बना लूं, तो अच्छा हो।
उसने ऊंट को गुरु मान लिया। ऊंट से उसने पूछा, गुरु, तुम्हें घर ले चलूं? ऊंट ने सिर हिला दिया। वह उसे घर ले आया। कुछ दिन बीतने पर वह ऊंट के पास जाकर कहने लगा, गुरु, मैं एक लड़की से प्रेम करता हूं, उससे शादी कर लूं? ऊंट ने सिर हिला दिया। फिर एक दिन वह बोला, गुरु जी, मेरे बच्चे नहीं हैं, मेरे घर-आंगन में कुछ बच्चे खेलने लगें तो...?
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ऊंट ने फिर सिर हिलाया। वह पिता बना, तो पूछने लगा, गुरु जी, दोस्त उत्सव मनाने के लिए कह रहे हैं। उसमें मदिरा भी पिएंगे। अपने मित्रों के साथ मदिरा पान मुझे भी करना होगा। ऊंट ने फिर सिर हिलाया। उस दिन के बाद से नित्या को शराब पीने की आदत लग गई।
उसका पत्नी के साथ झगड़ा होने लगा। एक दिन वह ऊंट से बोला, मेरी पत्नी दिन-रात मुझसे झगड़ती रहती है। उसकी हत्या कर दूं? ऊंट ने सिर हिला दिया और नित्या ने चाकू से पत्नी की हत्या कर डाली।