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Vasudev Dwadashi 2021: वासुदेव द्वादशी आज, जानें व्रत विधि, महत्व और कथा

Wed, 21 Jul 2021 08:57 AM IST
रुस्तम राणा धर्म डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

जो भक्त द्वादशी एकादशी व्रत को पूरी निष्ठा के साथ रखता है उसके पूर्व जन्म के सभी पाप मिट जाते हैं और वर्तमान जीवन में यश और कीर्ति की प्राप्ति होती है।
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वासुदेव द्वादशी 2021 - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
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वासुदेव द्वादशी हर साल आषाढ़ माह में शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि के दिन मनाई जाती है। इस साल यह पर्व 21 जुलाई 2021 बुधवार के दिन मनाया जाएगा। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन भगवान श्रीकृष्ण और माता लक्ष्मी की पूजा का विधान है। इस दिन विधि-विधान से वासुदेव द्वादशी का व्रत किया जाता है। माना जाता है कि इस व्रत को सबसे पहले मां देवकी ने किया था। जब उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण के लिए यह व्रत रखा था। जो भक्त द्वादशी एकादशी व्रत को पूरी निष्ठा के साथ रखता है उसके पूर्व जन्म के सभी पाप मिट जाते हैं और वर्तमान जीवन में यश और कीर्ति की प्राप्ति होती है। आइए, व्रत विधि और व्रत महत्व जानते हैं-

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वासुदेव द्वादशी व्रत विधि
इस दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें और व्रत का संकल्प करें।
इसके बाद भगवान श्रीकृष्ण और माता लक्ष्मी जी का स्मरण करें।
उन्हें पूजा में फल, फूल, धूप, दीप, अक्षत, भांग, धतूरा, दूध, दही और पंचामृत से करें। 
अंत में आरती-अर्चना कर भगवान श्रीकृष्ण और माता लक्ष्मी अन्न, जल और धन की कामना करें। 
शाम में पूजा अर्चना के पश्चात् आरती गाएं। 
और फिर फलाहार करके व्रत खोंले। 
अगले दिन पूजा-पाठ संपन्न कर गरीबों को दान करें। 
इसके बाद भोजन ग्रहण करें। 

वासुदेव द्वादशी महत्व
धार्मिक मान्यता के अनुसार, वासुदेव द्वादशी का व्रत का बड़ा महत्व है। माना जाता है कि इस व्रत को करने से व्यक्ति की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और उसके समस्त पाप कट जाते हैं। इस दिन भगवान कृष्ण के अनुयायी व्रत उपासना करते हैं। मंदिर और मठों में विशेष पूजा का आयोजन किया जाता है। 

वासुदेव द्वादशी व्रत कथा
पौराणिक कथा के अनुसार बहुत समय पहले चुनार नाम का एक देश था। इस देश के राजा का नाम पौंड्रक था। पौंड्रक के पिता का नाम वासुदेव था इसलिए पौंड्रक खुद को वासुदेव कहा करता था। वह पांचाल नरेश की राजकुमारी द्रौपदी के स्वयंवर में भी मौजूद था। पौंड्रक मूर्ख अज्ञानी था और उसके मूर्ख और चापलूस मित्रों ने कहा उससे कहा कि भगवान कृष्ण विष्णु के अवतार नहीं बल्कि पौंड्रक भगवान विष्णु का अवतार है। अपने मूर्ख दोस्तों की बातों में आकर राजा पौंड्रक नकली चक्र, शंख तलवार और पीत वस्त्र धारण करके अपने आप को कृष्ण समझने लगा। 
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एक दिन राजा पौंड्रक ने भगवान कृष्ण को यह संदेश भी भेजा की उसने धरती के लोगों का उद्धार करने के लिए अवतार धारण किया है, इसलिए तुम इन सभी चिन्हों को छोड़ दो नहीं तो मेरे साथ ही युद्ध करो। काफी समय तक भगवान कृष्ण ने मूर्ख राजा की बात पर ध्यान नहीं दिया, पर जब राजा पौंड्रक की बातें हद से बाहर हो गई तब उन्होंने उत्तर भिजवाया कि मैं तेरा पूर्ण विनाश करके तेरे घमंड का बहुत जल्द नाश करूंगा। भगवान श्री कृष्ण की बात सुनने के बाद राजा पौंड्रक श्री कृष्ण के साथ युद्ध की तैयारी करने लगा। अपने मित्र काशीराज की मदद पाने के लिए काशीनगर गया। 

भगवान कृष्ण ने पूरे सैन्य बल के साथ काशी देश पर हमला किया। भगवान कृष्ण के आक्रमण करने पर राजा पौंड्रक और काशीराज अपनी अपनी सेना लेकर नगर की सीमा पर युद्ध करने आ गए। युद्ध के समय राजा पौंड्रक ने शंख, चक्र, गदा, धनुष, रेशमी पितांबर आदि धारण किया था और गरुड़ पर विराजमान था। उसने बहुत ही नाटकीय तरीके से युद्ध भूमि में प्रवेश किया। 

राजा पौंड्रक के इस अवतार को देखकर भगवान कृष्ण को बहुत ही हंसी आई। इसके बाद भगवान कृष्ण ने पौंड्रक का वध किया और वापस द्वारिका लौट गए। युद्ध के पश्चात बदले की भावना से पौंड्रक के पुत्र ने भगवान कृष्ण का वध करने के लिए मारण पुरश्चरण यज्ञ किया, पर भगवन कृष्ण को मारने के लिए द्वारिका की तरफ गई वह आग की लपट लौटकर काशी आ गई और सुदर्शन की मृत्यु की वजह बनी। उसने काशी नरेश के पुत्र सुदर्शन का ही भस्म कर दिया। 

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