इसलिए किया जाता है नरकचतुर्दशी पर हनुमान जी का पूजन (प्रतीकात्मक तस्वीर)
इसलिए किया जाता है नरक चतुर्दशी पर हनुमान जी का पूजन
भगवान हनुमान संकट मोचन हैं इनकी कृपा से बड़े से बड़ा संकट भी टल जाता है। भगवान हनुमान के पिता का नाम केसरी और माता का नाम अंजना है, लेकिन ये पवनपुत्र भी कहलाते हैं। बजरंगबली के जन्मतिथि को लेकर अलग-अलग मान्यताएं हैं। एक धार्मिक मान्यता के अनुसार, अंजनी पुत्र का जन्म चैत्र मास की पूर्णिमा को हुआ था इसलिए उनका जन्म दिवस चैत्र पूर्णिमा के दिन भी मनाया जाता है लेकिन एक वाल्मिकी की रामायण के अनुसार भगवान हनुमान का जन्म कार्तिक मास में कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी के दिन स्वाति नक्षत्र में हुआ था। यह तिथि दिवाली उत्सव से एक दिन पहले यानी नरक चतुर्दशी की तिथि के रुप में पड़ती है, इसलिए नरक चतुर्दशी पर भगवान हनुमान की पूजा का भी विधान माना गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन भगवान हनुमान ने माता अंजना के गर्भ से अर्धरात्रि में जन्म लिया था।
यही कारण है कि हनुमान जी का जन्म दिवस लोग अपनी-अपनी मान्यताओं के अनुसार वर्ष में दो बार मनाते हैं, हालांकि दोनों ही तिथियों में वीर बजरंगी की पूजा करना बहुत ही शुभ माना गया है। वे अपने भक्तों की हर संकट से रक्षा करते हैं और भय से मुक्ति दिलाते हैं।
क्यों जलाते हैं यम के नाम का दीपक
नरक चतुर्दशी के दिन यम के निमित्त दीपदान करने के विषय में पुराणों में एक कथा मिलती है,जिसके अनुसार एक समय यमराज ने अपने दूतों से पूछा कि क्या कभी तुम्हें प्राणियों के प्राण हरण करते समय किसी पर दया नहीं आती है। पहले यमदूत संकोच में पड़ गए और कहा कि नहीं महाराज। तब यमराज ने उनसे दोबारा यही प्रश्न किया तो उन्होंने कहा कि एक बार एक ऐसी घटना घटी कि जिसे देखकर हमारा हृदय भी कांप उठा था। दूतों ने कहा, हेम नामक राजा की पत्नी ने एक पुत्र को जन्म दिया। उसके जन्म के बाद ज्योतिषियों ने नक्षत्र गणना करके राजा को बताया कि यह बालक जब भी विवाह करेगा, उसके चार दिन बाद ही इसकी मृत्यु हो जाएगी।
यह जानने के पश्चात उस राजा ने अपने पुत्र को यमुना तट की एक गुफा में ब्रह्मचारी के रूप में उसका लालन पालन किया, लेकिन एक दिन जब महाराजा हंस की युवा पुत्री यमुना तट पर घूम रही थी। उस ब्रह्मचारी युवक की दृष्टि उस कन्या पर पड़ी वह उस पर मोहित हो गया और उन्होंने गंधर्व विवाह कर लिया। ज्योतिष गणना के अनुसार जैसे ही विवाह के बाद चौथा दिन पूरा हुआ राजकुमार की मृत्यु हो गई। अपने पति की अकाल मृत्यु देखकर उसकी पत्नी अत्यंत करुण विलाप करने लगी। उस नवविवाहिता का करुण विलाप सुनकर हमारा हृदय भी कांप उठा।
यमदूतों ने कहा कि उस राजकुमार के प्राण हरण करते समय हमारे भी आंसू नहीं रुक पा रहे थे। तभी एक यमदूत ने यमराज से पूछा कि क्या अकाल मृत्यु से बचने का कोई उपाय नहीं है? इस पर यमराज ने बताया कि एक उपाय है। अकाल मृत्यु से छुटकारा पाने के लिए व्यक्ति को नरक चतुर्दशी के दिन दीपदान करना चाहिए। जहां पर नरक चतुर्दशी के दिन दीपदान किया जाता है वहां किसी को अकाल मृत्यु का भय नहीं रहता है। मान्यता है कि इसलिए लोग नरकचतुर्दशी के दिन यम के निमित्त दीपदान करने की परंपरा का निर्वहन करते हैं। हालांकि नरक चतुर्दशी के अलावा कुछ लोग धनतेरस के दिन भी यम के निमित्त दीपदान करते हैं।