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dussehra 2021: दहन के बाद लोग घर लाते हैं रावण की अस्थियां, जानिए क्या है इसके पीछे की वजह

Wed, 13 Oct 2021 12:03 PM IST
शशि सिंह धर्म डेस्क, अमर उजाला
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Dusshera 2021 (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : अमर उजाला
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हिंदी पंचांग के अनुसार,अश्विन मास में शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को विजय दशमी या दशहरा का त्योहार मनाया जाता है। सनातन धर्म में इस दिन को अधर्म पर धर्म की जीत के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। इस बार दशहरा का पर्व 15 अक्टूबर 2021 दिन शुक्रवार को पड़ रहा है। प्रत्येक वर्ष लोग रावण के पुतले का दहन करके बुराई के प्रतीक को जलाते हैं, लेकिन इसी के साथ रावण एक प्रकांड पंडित व महाज्ञानी विद्वान था। रावण के ज्ञान और विद्वता की प्रशंसा स्वयं प्रभु श्री राम ने भी की थी। विजयदशमी की तिथि को अत्यंत शुभ माना जाता है और इस दिन शस्त्र पूजन का भी विधान है। इसके अलावा भी इस तिथि को लेकर कई मान्यताएं हैं, उन्हीं में से एक मान्यता है रावण दहन के बाद बचे अस्थि-अवशेषों को अपने घर ले जाना। यह अत्यंत ही शुभ माना जाता है। तो चलिए जानते हैं कि रावण की अस्थियों को घर ले जाना क्यों माना जाता है इतना शुभ और कैसे शुरु हुई ये परंपरा।

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दशहरा 2021 (प्रतीकात्मक तस्वीर)
इस कारण चली आ रहा है रावण की अस्थियां घर लाने की परंपरा
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार जब भगवान श्री राम ने रावण का वध करके लंका पर विजय प्राप्त कर ली तो उनकी सेना रावण वध और लंका पर विजय प्राप्ति के प्रमाण स्वरूप लंका की राख अपने साथ ले आई थी। यही कारण है कि आज भी लोग लंका और रावण दहन के बाद अवशेषों को अपने घर ले जाते हैं। तब से लेकर अब तक यह अस्थि-अवशेष को घर लाने की पंरपरा चली आ रही है।
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दशहरा 2021 (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : अमर उजाला
रावण की अस्थियों को घर लाने के पीछे ये हैं मान्यताएं
देवताओं के कोषाध्यक्ष कुबेर रावण के भाई थे, उन्हीं के द्वारा स्वर्ण की लंका बनाई गई थी जिसमें रावण निवास करता था। इसलिए मान्यता है कि रावण की अस्थियां व लंका अवशेषों को घर में लाने से सुख-समृद्धि बनी रहती है। कहा जाता है कि धन कोषाध्यक्ष कुबेर के द्वारा बनाई गई लंका के अवशेष घर में रखने से स्वयं कुबेर का वास होता है।

नहीं आती है नकारात्मक ऊर्जा 
रावण महाज्ञानी, पराक्रमी और बहुत ही शक्तिशाली योद्धा था। उस पर विजय पाना अत्यंत कठिन था। माना जाता है कि यदि घर में रावण की अस्थियां हो तो नकारात्मक ऊर्जा नहीं आती है व भय से मुक्ति मिलती है। इसलिए लोग रावण दहन के बाद अस्थियों के प्रतीकात्मक रुप में रावण के पुतले के अवशेषों को अपने घर ले जाते हैं।
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