आषाढ़ माह के शुक्लपक्ष की एकादशी को हरिशयनी एकादशी के रूप में मनाया जाता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार इस दिन भगवान श्रीहरि शयन करना आरम्भ करते हैं, जिसके परिणामस्वरूप संसार के सभी मांगलिक शुभ कार्य जैसे शादी-विवाह, गृह प्रवेश, यज्ञोपवीत आदि होने बंद हो जाते हैं। इसी दिन से सन्यासी वर्ग का चातुर्मास्य व्रत आरम्भ हो जाता हैं। आषाढ़ शुक्ल एकादशी से शयन आरम्भ करते हुए भगवान श्रीहरि कार्तिक शुक्ल एकादशी को जागते हैं। इस अवधि के मध्य श्रीविष्णु भादों शुक्ल एकादशी को करवट बदलते हैं। सभी शास्त्रों और धर्मग्रन्थों में इस एकादशी के व्रत को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चारों पुरुषार्थ देने वाला कहा गया है।
इसके महत्व को बताते हुए सभी-ऋषि मुनि कहते हैं कि, नास्ति गंगासमं तीर्थं नास्ति मातृसमो गुरु:। नास्ति विष्णुसमं देवं तपो नानशनात्परम।। नास्ति क्षमासमा माता नास्ति कीर्तिसमं धनं। नास्ति ज्ञानसमो लाभो न च धर्मसमः पिता। न विवेकसमो बन्धुर्नैकादश्याः परं व्रतं। अर्थात गंगा के सामान कोई तीर्थ नहीं है। माता के सामान कोई गुरु नहीं है। भगवान विष्णु के सामान कोई देवता नहीं है। उपवास से बढ़कर कोई तप नहीं है। क्षमा के सामान कोई माता नहीं है। कीर्ति के सामान कोई धन नहीं है। ज्ञान के सामान कोई लाभ नहीं है। धर्म के सामान कोई पिता नहीं है,विवेक के सामान कोई बंधु नहीं है और एकादशी से बढ़कर कोई व्रत नहीं है।
इस दिन भगवान नारायण कि मूर्ति जिसमें चारों भुजाएं जिसमें शंख ,चक्र, गदा और पद्म सुशोभित हो, उस प्रतिमा कि पीले वस्त्र धारण कराकर मूर्ति के आकार के सुंदर पलंग पर लेटाकर पंचामृत और शुद्ध जल से स्नान कराकर षोडशोपचार विधि से पूजन करे। उसके बाद श्रीहरि की प्रार्थना इस प्रकार करें, 'सुप्ते त्वयि जगन्नाथ जगत्सुप्तम भावेदिदम। विबुद्धे त्वयि बुद्धं च जगत्सर्वं चराचरम।। हे जगन्नाथ ! आपके सो जाने पर यह संपूर्ण जगत सो जाता है और आपके जागृत होने यह संपूर्ण चराचर जगत भी जागृत रहता है। इस प्रकार निवेदन करते हुए प्रणाम करें। एकादशी के दिन व्रती को झूठ बोलने, ठगी करने, दूसरे का अहित सोचने, बड़ों का अपमान करने से बचते हुए ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए। इस प्रकार मानव हरिशयनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु की पूजा करके दैहिक, दैविक और भौतिक यानी तीनों तापों से मुक्त होकर जीवन मरण के बंधन से भी मुक्त हो नारायण में ही विलीन हो जाता है।