नहीं होंगे विवाह-मांगलिक कार्य
ज्योतिषाचार्य पं.मनोज कुमार द्विवेदी ने बताया कि अक्षय तृतीया स्वयंसिद्ध मुहूर्त होने के कारण विवाह,गृह प्रवेश, मुंडन आदि शुभ मांगलिक कार्यों के लिए मुहूर्त की जरूरत नहीं होती। कई वर्षों के बाद ऐसा संयोग बन रहा है,जब अक्षय तृतीया के दिन गुरु और शुक्र के अस्त होने के कारण विवाह आदि मांगलिक कार्य पर पाबंदी रहेगी।
वर्जित कार्य
विवाह, गृह प्रवेश, नई वधू का गृह प्रवेश और द्विरागमन, जनेऊ, मुंडन
होंगे ये कार्य
अन्नप्राशन, दुकान, वाहन क्रय, स्वर्ण और चांदी क्रय विक्रय एवं नामकरण
शुभ योग
वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि 10 मई शुक्रवार को अक्षय तृतीया पर सुकर्मा योग बन रहा है। इस योग का निर्माण दोपहर 12 बजकर 08 मिनट से हो रहा है, जो दिन भर है। साथ ही रवि योग का भी संयोग बनेगा। इस दिन प्रातः काल 05 बजकर 33 मिनट से सुबह 10 बजकर 37 मिनट तक खरीददारी कर सकते हैं। दोपहर के समय में 12 बजकर 18 मिनट से लेकर 01 बजकर 59 मिनट तक सोना, चांदी,वाहन, इलेक्ट्रॉनिक सामान खरीदने हेतु शुभ समय है। जबकि, संध्याकाल में 09 बजकर 40 मिनट से रात 10 बजकर 59 मिनट तक शुभ समय है।
अक्षय तृतीया का महत्व
ऐसी मान्यताएं हैं कि अक्षय तृतीया पर सोने-चांदी की चीजें खरीदने से जातक का भाग्योदय होता है। इसके अलावा, पवित्र नदियों में स्नान, दान, ब्राह्मण भोज, कर्म, यज्ञ और ईश्वर की उपासना जैसे उत्तम कार्य इस तिथि पर अक्षय फलदायी माने गए हैं। धार्मिक मान्यता अनुसार, इस दिन शुरू किया गया कोई भी कार्य आसानी से संपन्न हो जाता है।
अक्षय तृतीया तिथि
इस साल अक्षय तृतीया तिथि का 10 मई को सुबह 4 बजकर 17 मिनट पर आरंभ होगा। इस तृतीया तिथि का समापन 11 मई को सुबह 02 बजकर 50 मिनट पर होगी। उदया तिथि के चलते अक्षय तृतीया 10 मई को मनाई जाएगी।
क्यों खास है अक्षय तृतीया?
अक्षय तृतीया को कई वजहों से साल का सबसे शुभ दिन माना जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, सतयुग और त्रेतायुग की शुरुआत अक्षय तृतीया से ही हुई थी। भगवान विष्णु ने नर नारायण का अवतार भी इसी दिन लिया था। भगवान परशुराम का जन्म भी अक्षय तृतीया पर हुआ था। इस शुभ तिथि से ही भगवान गणेश ने महाभारत का काव्य लिखना शुरू किया था। इतना ही नहीं, अक्षय तृतीया से ही बद्रीनाथ के कपाट खुलते हैं और केवल इसी दिन वृन्दावन में भगवान बांके-बिहारी जी के चरणों के दर्शन होते हैं। कहते हैं कि इसी दिन विष्णु जी के चरणों से मां गंगा धरती पर अवतरित हुई थीं। वैशाख शुक्ल तृतीया तिथि को आखा तीज के रूप में भी मनाया जाता है। कुछ लोग इसे अक्षय तीज भी कहते हैं। बसंत का समापन और ग्रीष्म ऋतु का होगा आरंभ अक्षय तृतीया को बसंत का अंत और ग्रीष्म ऋतु का आरंभ माना जाता है। इसलिए इस दिन जल से भरे घड़े, कुल्हड़, सकोरे, पंखे खड़ाऊं, छाता, सत्तू, तरबूज ककड़ी आदि गर्मी में लाभकारी वस्तुओं का दान किया जाता है। इस दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर गंगा स्नान करके भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी के पूजन की परंपरा है। नैवेद्य में जौ का सत्तू, ककड़ी, और चने की दाल अर्पित किया जाता है। इस दिन सत्तू अवश्य खाने तथा नई वस्तु और आभूषण पहनने की परंपरा है।