हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय के शिक्षक, गैर शिक्षक कर्मचारियों के बच्चों को पीएचडी में प्रवेश के लिए भले ही ईसी से मंजूरी दिलवाकर प्रावधान किया है। मगर इस तरह से प्रवेश दिलवाकर दी जाने वाली पीएचडी की डिग्री की वैधता पर भी आने वाले समय में सवाल उठ सकते हैं। विश्वविद्यालयों के लिए बनी राष्ट्रीय स्तर की रेगुलेटरी बॉडी यूनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन के पीएचडी को लेकर बनाए गए रेगुलेशन के अनुसार ही हर विश्वविद्यालय को प्रवेश देना होता है।
विश्वविद्यालय भले ही एक स्वायत संस्था है, मगर इसमें किसी भी प्रस्ताव को ले जा कर मंजूरी दिलवाकर यूजीसी के रेगुलेशन की उल्लंघना नहीं की जा सकती। यूजीसी के रेगुलेशन के अनुसार पीएचडी में दो ही तरीकों से प्रवेश दिया जा सकता है। इसमें पहला प्रवेश परीक्षा और दूसरा जेआरएफ परीक्षा पास कर फेलोशिप लेने वाले छात्रों के साथ ही इंस्पायर फेलोशिप और अन्य राष्ट्रीय स्तर फेलोशिप ले रहे छात्रों को सीधे पीएचडी में प्रवेश दिया जा सकता है। हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय प्रशासन ने विवि कर्मियों के बच्चों को हर विभाग में एक एक सीट आरक्षित कर बिना प्रवेश परीक्षा और बिना नेट जेआरएफ पास किए प्रवेश देने का जो प्रावधान किया है, इसमें दोनों ही नियम फॉलो नहीं हो रहे हैं।
अब जबकि विशेष प्रावधान कर कुछ अधिकारियों के बच्चों को प्रवेश दिया जा चुका है, सुपरवाइजर तक तय हो चुके हैं, तो असल समस्या डिग्री की सर्टिफिकेशन के समय में पेश आ सकती है। रेगुलेशन के जानकारों की मानें तो पीएचडी डिग्री देने से पूर्व इसकी सर्टिफिकेशन के समय में सुपरवाइजर, विभाग चेयरमैन, डीन फैकल्टी और अंत में डीएस सर्टिफिकेट जारी करता है। जिसमें एक कॉलम रहता है कि किस आधार पर पीएचडी में प्रवेश दिया गया है, उसका अलग से कॉलम रहता है। इस कॉलम में क्या भरा जाएगा यह विवि प्रशासन को सोचना होगा।
एचपीयू को बना दिया भ्रष्टाचार का अड्डा: माकपा
विवि में बिना प्रवेश परीक्षा पीएचडी में दाखिला देने के मामले में माकपा ने भी मोर्चा खोल दिया है। माकपा की लोकल कमेटी ने इसका विरोध करते हुए कहा कि विश्वविद्यालय को भ्रष्टाचार का अड्डा बनाया जा रहा है। आरएसएस और भाजपा विचारधारा के लोगों को बैक डोर से नौकरी और कोर्स में प्रवेश दिलवाने के मामले उजागर हो रहे हैं।
आम कर्मचारियों के नाम पर अफसरों ने अपने लाडलों को सीधे प्रवेश देने की पूरी साजिश रची है। विवि के दावे के अनुसार यदि मौका दिया गया था, तो सिर्फ तीन अधिकारियों के बच्चों ने ही आवेदन कैसे किया, उन्हें ही प्रवेश कैसे मिला, शेष 1200 गैर शिक्षक और करीब 350 शिक्षकों के एक भी बच्चे को प्रवेश क्यों नहीं मिला। इससें जाहिर है कि यह फार्मूला सिर्फ अपने बच्चों के लिए ही अपनाया गया। सचिव बाबू राम ने कहा कि यही नहीं दीन दयाल उपाध्याय पीठ में सिर्फ चहेतों को ही पीएचडी में प्रवेश दिया गया है। उनका आरोप है कि सरेआम यूजीसी, विवि के आर्डिनेंस को नजरअंदाज कर मनमानी कर अपने चहेतों को लाभ दिया जा रहा है।