कारोबार के लिए जाते व्यापारियों के दस्तावेज देखते सेना के जवान।
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आज दुनिया नकद से डिजिटल भुगतान तक पहुंच चुकी है, लेकिन भारत-चीन सीमा पर किन्नौर के शिपकी ला में सदियों पुरानी वस्तु विनिमय प्रणाली आज भी जारी है। छह साल बाद फिर शुरू हुए सीमा व्यापार में यहां न नकद चलता है, न ऑनलाइन भुगतान। 1697 में तिब्बत और बुशहर रियासत के बीच हुई संधि के अनुसार आज भी सामान के बदले सामान का लेनदेन होता है।
शनिवार को शिपकी ला मार्ग, उत्तराखंड के लिपुलेख और सिक्किम के नाथू ला मार्ग से चीन के साथ कारोबार छह साल बाद शुरू हुआ। शिपकी ला मार्ग से होने वाला कारोबार अन्य दोनों मार्गों से अलग है। इस मार्ग से होने वाले कारोबार में आज भी वस्तुओं का आदान-प्रदान होता है। इस अनूठी परंपरा की नींव वर्ष 1697 में पड़ी थी, जब तिब्बत और तत्कालीन बुशहर रियासत के राजा केहरी सिंह के बीच विनियमित वस्तु विनिमय व्यापार संधि हुई। खास बात यह है कि यह समझौता किसी लिखित दस्तावेज के बजाय पारंपरिक लोक शपथ ‘गामग्या’ और आपसी विश्वास पर आधारित था।
तीन सदी से अधिक समय बीतने के बाद भी सीमा व्यापार उसी परंपरा और नियमों के अनुसार जारी है। यह विनियमित वस्तु विनिमय व्यापार संधि में ऊपरी किन्नौर के सीमावर्ती गांवों, जिनमें नामगिया, चुप्पन, नाको, पूह और चांगो शामिल हैं। 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद इस मार्ग से कारोबार को बंद किया गया था।
बाद में द्विपक्षीय प्रोटोकॉल के तहत 1992-1994 में इसे दोबारा शुरू किया गया। आंकड़ों के अनुसार व्यापार में भागीदारी में उतार-चढ़ाव भी आया है। साल 2015 में 71 भारतीय व्यापारी, 2016 में 75, 2017 में 34, 2018 में 37 और 2019 में 45 व्यापारियों ने सीमा पार की। सबसे अधिक व्यापार 1994 में हुआ, जब 90 व्यापारियों ने भाग लिया।