हिमाचल के प्रथम डीजीपी आईबी नेगी
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शांत किन्नौर ने विकास के नाम पर बहुत कुछ खोया है। यह ब्लास्टिंग का ही नतीजा है। जब यह सब नहीं था तो विकास बेशक कम था, मगर इस तरह के बड़े हादसे भी नहीं होते थे। अब अपनी ही माटी के दरक जाने से भयभीत बड़ी संख्या में किन्नौरवासी विस्थापित होने लगे हैं। वे शिमला, सोलन, जीरकपुर आदि में मकान बनाकर बसने लगे हैं। यह बात हिमाचल प्रदेश के प्रथम डीजीपी रहे 89 वर्षीय विद्वान-चिंतक और किन्नौर के मूल निवासी आईबी नेगी ने कही। नेगी सांगला के निवासी हैं, मगर उनकी शिमला के खलीणी में अपनी कोठी है। आईबी नेगी हिमाचल प्रदेश से यूपीएससी की परीक्षा उत्तीर्ण कर बने पहले डायरेक्ट आईपीएस अधिकारी हैं।
आईबी नेगी ने बुधवार को अमर उजाला से विशेष बातचीत में बताया कि निगुलसरी का हादसा बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है। यह बहुत बड़ा नुकसान हुआ है। किन्नौर में बडे़-बडे़ बिजली प्रोजेक्टों को लगाने से ऐसा हो रहा है। यहां की पारिस्थितिकी का ठीक से अध्ययन कर बिजली प्रोजेक्ट नहीं लगाए गए हैं। यहां जो भी पावर प्रोजेक्ट लगाने चाहिए थे, वे स्विट्जरलैंड की तर्ज पर तीन या पांच मेगावाट के होते तो अच्छा होता। आज यहां हजारों मेगावाट के बड़े प्रोजेक्ट लगाए जा रहे हैं। थोड़े से पैसों के लिए बहुत बड़ा नुकसान किया गया है। अफसोस है इस बात का। लाहौल स्पीति वाले इस बारे में ठीक विरोध कर रहे हैं कि वे किन्नौर की तरह पहाड़ों को खत्म नहीं करना चाहते।
सांगला के रहने वाले हैं। किन्नौर बहुत बदला है। यहां सड़कें बननी हैं, ये तो सही है, पर अब वहां फोरलेन बनाए जाने की बातें होने लगी हैं, जिसकी जरूरत नहीं है। जो सड़कें हैं उन्हें ठीक से मेंटेन किया जाना चाहिए। पचास-साठ साल पहले किन्नौर बहुत शांत क्षेत्र था। पहले कभी भी ऐसे हादसे नहीं होते थे। सतलुज के साथ जो सड़क बनी है, इसमें काफी लोगों की मृत्यु हुई थी, यह उस समय का बड़ा हादसा था। जब वह पढ़ाई कर रहे थे तो यह सड़क तो थी ही नहीं। वह पांच दिन में सांगला से शिमला पहुंचते थे। सांगला से तीन दिन में रामपुर पहुंचते थे। वहां से दो दिन शिमला पहुंचने में लगते थे। आज अच्छा है कि समय बच रहा है। किन्नौर की दूरी घट गई है। लोग पढ़-लिख गए हैं और विकास भी हुआ है। बिजली प्रोजेक्टों ने रोजगार दिया है, पर किन्नौर अब पहले जैसा नहीं रहा। ब्लास्टिंग ने इसे बहुत कमजोर कर दिया है।