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शिक्षिका की सुरक्षा में शौच जाने को मजबूर छात्राएं

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राजधानी के सबसे भीड़भाड़ वाले उपनगर संजौली स्थित प्राइमरी स्कूल में 6 से 12 साल के मासूम बच्चों पर सरकारी सिस्टम को जरा भी तरस नहीं आ रहा।
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मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह की घोषणा और करोड़ों के बजट के बावजूद प्रारंभिक शिक्षा विभाग स्कूल में एक अदद टॉयलेट का प्रबंध नहीं कर पा रहा।

विभाग की ओर से इस तरह के उदासीन रूख को देख स्कूल प्रबंधन ने मासूम छात्राओं की सुरक्षा के मद्देनजर एक नया उपाय निकाला है। कक्षा खत्म होने के बाद अब खुले में छात्राओं को टॉयलेट ले जाने के लिए एक शिक्षिका और महिला कर्मचारी की ड्यूटी लगाई है।

लापरवाही और संवेदनहीनता का इससे शर्मनाक उदाहरण शायद ही कहीं देखने को मिले। विभाग की उदासीनता का आलम यह है कि शौचालय निर्माण प्रक्रिया की फाइल अभी तक निदेशक के पास नहीं पहुंची है।
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जबकि बीईईओ की मानें तो 20 सितंबर को अमर उजाला में खबर प्रकाशित होने के एक सप्ताह के भीतर ही शौचालय निर्माण के इस्टीमेट की फाइल उप निदेशक शिमला को भेज दी गई थी।
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शार्मिंदा होने को मजबूर

उधर, अमर उजाला में खबर छपने के बाद स्कूल प्रशासन थोड़ा अलर्ट हुआ। प्राचार्य ने कहा कि अब किसी भी छात्रा को शौच के लिए अकेले नहीं भेजा जाता है।

यानी आज भी मासूम बच्चे लघुशंका व शौच से निवृत्‍त होने के लिए खुले में झाडि़यों की ओट तलाशते हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि इन झाडि़यों में सांप और दूसरे जंतुओं का खतरा हमेशा बना रहता है।

यह सरकारी प्राइमरी स्कूल संजौली के लक्ष्मीनारायण मंदिर के समीप स्थित है। यहां स्कूल में शौचालय की कोई व्यवस्था नहीं है। ऐसे में अब गंदगी फैली रहती है और झाडि़यों में खुले में शौच की असहनीय दुर्गंध उठती है।

स्कूल से समीप आम रास्ता और मंदिर होने के कारण लोगों का आना-जाना दिन भर जारी रहता है। ऐसे में छात्राएं ही नहीं, स्कूल के छात्र भी सुरक्षित महसूस नहीं कर रहे हैं।
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