भूस्खलन की दृष्टि कुल्लू के पहाड़ अति संवेदनशील हैं। सरकार और प्रशासन मात्र सर्वे तक ही सीमित है।कुल्लू की धार्मिक नगरी मणिकर्ण से सटी गाड़की की पहाड़ी कभी भी तबाही मचा सकती है। अगस्त 2015 को पहाड़ी से गिरी चट्टानों से मणिकर्ण में सात श्रद्धालुओं की मौत हो गई थी। जिले में बरसात के मौसम में सबसे अधिक जान माल का नुकसान होता आया है। इसमें मणिकर्ण घाटी भी शामिल है।
विदेशी सैलानियों की पसंदीदा सैरगाह पार्वती घाटी में कई पर्यटकों की जान चली गई है। अगस्त 2015 में भी मणिकर्ण में गुरुद्वारे की सराय पर विशाल चट्टानें गिरने से सात लोगों की मौत हो गई थी। जबकि हादसे में 11 श्रद्धालु घायल हो गए थे। मणिकर्ण पर यह खतरा अभी भी मंडराया हुआ है। भूगर्भ वैज्ञानिकों के दल ने गाड़गी की पहाड़ियों का दौरा कर इसकी रिपोर्ट कुल्लू जिला प्रशासन को सौंपी है। भूगर्व वैज्ञानिकों ने रिपोर्ट में बड़े खतरे की ओर इशारा करते हुए पहाड़ी में मैश नेटिंग, कैच बैरियर, रिटेनिंग स्ट्रक्चर तैयार करने सहित अन्य कई सुझाव दिए हैं।
हादसे वाले दिन करीब 2000 मीटर ऊपर से करीब 95 डिग्री की ढलान में बड़ी-बड़ी चट्टानें गिरी थी। बताया जाता है कि सर्वे ऑफ इंडिया ने 1964 में भी इस जगह को भूस्खलन के लिहाज से अति संवेदनशील माना है। इस जगह पर भवन निर्माण की मनाही है। मणिकर्ण पंचायत के उपप्रधान चेत राम ने कहा कि छह साल का समय हो गया है, लेकिन सर्वे ऑफ इंडिया की रिपोर्ट पर कोई भी अमल नहीं हुआ है। एसडीएम कुल्लू विकास शुक्ला ने कहा कि रिपोर्ट को देखा जाएगा और जरूरी कदम उठाए जाएंगे।