इसके बाद से ही रेणुका में बाघ के जोड़ों को लाने की योजना पर काम होने लगा। लेकिन तीन सालों से यह योजना भी लंबित पड़ी हुई है। बताया जा रहा है कि अब सेंट्रल जू अथॉरिटी की औपचारिकताएं पूरी नहीं हो पा रही हैं। वहीं, वन सेंक्चुरी क्षेत्र होने की वजह से भी इसकी अनुमति जरूरी हो गई है।
मार्च 2015 में मादा शेर और अप्रैल 2015 में नर शेर के मरने के बाद से यहां पर वीरानगी छाई हुई है। सबसे आखिर में यहां शिशु नामक शेर की मौत हुई थी। इसके बाद से यहां खाली पिंजरे पड़े हुए हैं। वन्य प्राणी विभाग ने इसके बाद बाघ लाने का प्रस्ताव भेजा।
सात हेक्टेयर में फैली है सफारी
रेणुका की सफारी में सैकड़ों की संख्या में लोग पहुंचते थे। उस दौरान यहां पांच रुपये टिकट रखा गया था। लेकिन, अब यहां सिर्फ खाली पिंजरे रह गए हैं। यह सफारी कुल सात हेक्टेयर में फैली हुई है।
वन्य प्राणी विभाग के डीएफओ राजेश शर्मा ने बताया कि शेरों की उपलब्धता कहीं भी नहीं है। इनके स्थान पर बाघ को लाने की योजना बनाई है। लेकिन, वन सेंक्चुरी का क्षेत्र होने के कारण कई आपत्तियां सामने आई हैं। सेंट्रल जू अथॉरिटी ने पहले वन एवं पर्यावरणीय क्लीयरेंस मांगी है। उसके बाद ही यहां पर बाघ लाए जा सकेंगे।