स्कूल शिक्षा निदेशालय की ओर से जारी निर्देश के अनुसार शिक्षक अब हर महीने के आखिरी शनिवार को बैग फ्री डे के दौरान विद्यार्थियों के साथ उनकी स्थानीय बोलियों में बातचीत करने के लिए 30 मिनट समर्पित करेंगे। इस कदम का उद्देश्य छात्रों और शिक्षकों के बीच संवाद की खाई को पाटना है, खासकर उन बच्चों को लाभ पहुंचाना है जो घर पर मुख्य रूप से क्षेत्रीय बोली बोलते हैं। यह पहल एनईपी 2020 के मार्गदर्शक सिद्धांतों पर आधारित है, जो प्रारंभिक और आधारभूत शिक्षा में मातृभाषाओं और स्थानीय भाषाओं के महत्व पर जोर देती है। शिक्षा मंत्री रोहित ठाकुर ने कहा कि भाषाई विविधता को बढ़ावा देना और हिमाचल प्रदेश की समृद्ध बोली विरासत को संरक्षित करने के लिए यह निर्णय लिया गया है।
जिला की स्थानीय भाषा के अनुसार पहाड़ी, किन्नौरी, कांगड़ी, मंडयाली, कुल्लवी, लाहौली, चंबयाली आदि का अब स्कूल में विशेष दिवस पर प्रयोग किया जाएगा। उन्होंने कहा कि स्कूल के वातावरण में अपनी मूल बोलियों के प्रयोग को प्रोत्साहित कर छात्रों की सांस्कृतिक पहचान और गौरव को सुदृढ़ करना है। इससे छात्र-शिक्षक संबंध को बेहतर बनाया जाएगा। विशेष रूप से ग्रामीण और जनजातीय पृष्ठभूमि के छात्रों के लिए, जहां रोजमर्रा के संवाद में क्षेत्रीय बोलियां प्रमुखता से प्रयोग में आती हैं। शिक्षा मंत्री ने कहा कि सभी शैक्षणिक संस्थानों के प्रमुखों को अपने-अपने स्कूलों में इस निर्देश का प्रभावी कार्यान्वयन सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए हैं। शिक्षकों को स्थानीय बोली में कहानी सुनाने के सत्र, पारंपरिक खेल, लोकगीत, पहेलियां या छोटी चर्चाएं करने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा।