नाहन से करीब 120 किलोमीटर दूर पहाड़ पर बसा है गिरिपार क्षेत्र का शिलाई। कहने को यह उपमंडल मुख्यालय है, लेकिन यहां तक पहुंचने के लिए लगभग 20 किलोमीटर का कच्चा रास्ता पार करना पड़ता है। इस दुर्गम पहाड़ी इलाके में न सिंचाई की सुविधा है और न ही कोई उद्योग धंधा। ज्यादातर लोग खेती और मजदूरी कर अपना परिवार चला रहे हैं। यह दर्द शिलाई की ही नहीं, ट्रांसगिरि इलाके के अधिकतर गांवों का है।
गिरि और टौंस नदी से घिरे ट्रांसगिरि क्षेत्र में करीब 95 फीसदी आबादी खेती पर निर्भर है और खेती पूरी तरह बारिश पर। इलाके में सिंचाई की सुविधा न के बराबर है। रोजगार का कोई साधन न होने और सुविधाओं के अभाव में शिलाई समेत ट्रांसगिरि क्षेत्र से लोग पलायन को मजबूर हो रहे हैं। कई रोजी-रोटी के लिए घर-बार छोड़कर विपरीत परिस्थितियों में बाहर काम कर रहे हैं। भौगोलिक विषमताओं और अभावों में जी रहे हाटी लोग आर्थिक पिछड़ेपन के आधार पर भी जनजातीय दर्जे की मांग कर रहे हैं।
हिमाचल विश्वविद्यालय के जनजातीय अध्ययन संस्थान के सर्वे के अनुसार गिरिपार के सत्तर फीसदी गांवों तक पक्की सड़क नहीं है। ट्रांसगिरि का तेरह फीसदी इलाका ही स्टेट हाईवे से जुड़ सका है। जिला प्रशासन के आंकड़े बताते हैं कि गिरिपार के 95 फीसदी लोग खेतीबाड़ी और पशुपालन पर निर्भर हैं। छोटे-छोटे और बिखरे हुए खेतों में परंपरागत तरीके से खेती के कारण भी हाटी समुदाय की आर्थिकी सुदृढ़ नहीं हो पा रही है। बागवानी की दृष्टि से यह क्षेत्र अति पिछड़ा है। यहां महज 0.3 एकड़ क्षेत्र में ही बगीचे हैं।
इन तमाम दुश्वारियों के बावजूद हाटी समुदाय को एसटी का दर्जा नहीं मिल पा रहा है। केंद्रीय हाटी समिति के अध्यक्ष प्रताप सिंह तोमर कहते हैं कि गिरिपार के लोग कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में अपना गुजर बसर कर रहे हैं। हालांकि, परिस्थितियां पहले से कुछ बदलीं हैं, लेकिन दूसरे इलाकों की अपेक्षा गिरिपार पिछड़ा हुआ है। जनजातीय दर्जा मिलने पर इस इलाके के लोगों को विकास की मुख्यधारा से जुड़ने का मौका मिल सकता है।
हाटी युवा संघर्ष समिति के अध्यक्ष देवेंद्र सिंह तोमर कहते हैं कि शिलाई समेत गिरिपार क्षेत्र के कई गांवों में सड़क जैसी मूलभूत सुविधाएं नहीं हैं। कई गांवों के लिए कच्ची सड़कें हैं, लेकिन उनकी हालत बदतर है। उपमंडल मुख्यालय तक लोगों को हिचकोले खाकर पहुंचना पड़ रहा है। शिलाई के पूर्व प्रधान रमेश नेगी का कहना है कि क्षेत्र में रोजगार के अवसर नहीं होने के कारण लोग पलायन करने को मजबूर हैं। हाटी समिति पांवटा इकाई के अध्यक्ष ओमप्रकाश चौहान, गिरिपार के अतर सिंह नेगी, राजेंद्र सिंह नेगी, एडवोकेट राजेंद्र नेगी, देवेंद्र वर्मा, रण सिंह चौहान, और नरेश पराशर कहते हैं कि एसटी दर्जे के लिए गिरिपार का दावा मजबूत है। पिछड़े हुए इलाके के लोगों को उनका हक मिलना चाहिए।
जनजातीय दर्जे के दावे के मुख्य आधार
1. अलग संस्कृति, अनोखी परंपराएं
गिरिपार के हाटी समुदाय की संस्कृति और परंपराएं भी उन्हें अन्य लोगों से अलग करती हैं। यहां दीपावली के एक महीने बाद बूढ़ी दिवाली मनाई जाती है। इसमें मूड़ा, बेड़ोली, चिऊड़ी और शाकुलली जैसे पकवान बनते हैं। बिशु और मौण के रूप में यहां युद्ध उत्सव मनाए जाते हैं। इनमें लोग अपनी वीरता का प्रदर्शन करते हैं। ठोडा खेल इसमें विशेष है। हाटी समुदाय से जुडे़ शिलाई कॉलेज में इतिहास के प्रवक्ता बीआर ठाकुर कहते हैं कि गिरिपार की यह संस्कृति जाेंसार के अलावा दुनिया में कहीं और देखने को नहीं मिल सकती। इसे महफूज रखने के लिए एसटी का दर्जा मिलना जरूरी है।
2. मिल बैठकर निपटाते हैं विवाद
हाटी समुदाय आपसी विवादों को निपटारा मिल-बैठकर करता है। इसके लिए गांव में खुमली बुलाई जाती है। खुमली में हर बेहड़े से बुजुर्ग (सयाणे) शामिल होते हैं। खुमली का फैसला दोनों पक्षों के लिए मान्य होता है। खुमली के पास दंड स्वरूप जुर्माना लगाने का भी अधिकार है।
3. कौरवों और पांडवों से संबंध
गिरिपार के हाटी खुद को शाठा और पांशा दो दलों में बांटते हैं। पांशा दल के लोग खुद को पांडवों और शांठा दल के लोग कौरवों से संबंधित मानते हैं।