रिपोर्ट के अनुसार राज्य के शहरी क्षेत्रों में प्रतिदिन 420.82 टन ठोस कचरा उत्पन्न होता है, जबकि लगभग 20.48 टन कचरा संग्रहित नहीं हो पाता और लगभग 20.87 टन कचरा अब भी लैंडफिल अथवा अस्थायी डंपिंग स्थलों पर डाला जा रहा है। अधिकरण ने पाया कि कई शहरी निकाय आज भी वैज्ञानिक कचरा निस्तारण की व्यवस्था विकसित नहीं कर पाए हैं। पीठ ने यह भी गंभीर चिंता व्यक्त की कि पूरे राज्य में 295 कचरा हॉटस्पॉट अब भी मौजूद हैं, जिनमें अकेले शिमला नगर निगम क्षेत्र में 28 हॉटस्पॉट हैं। अधिकरण ने कहा कि इन हॉटस्पॉट्स का बने रहना घर-घर कचरा संग्रहण तथा स्रोत पर पृथक्करण व्यवस्था की कमियों को दर्शाता है।
तरल अपशिष्ट प्रबंधन पर अधिकरण ने कहा कि राज्य में प्रतिदिन लगभग 159.117 एमएलडी सीवेज उत्पन्न होता है, जबकि वास्तविक उपचार केवल 88.293 एमएलडी का हो रहा है। अर्थात लगभग 44.5 प्रतिशत सीवेज बिना उपचार के नदियों, नालों, झीलों और अन्य जलस्रोतों में प्रवाहित हो रहा है। पीठ ने यह भी पाया कि 20 सीवेज उपचार संयंत्र (एसटीपी) निर्धारित मानकों का पालन नहीं कर रहे हैं तथा अनेक एसटीपी बिना वैध अनुमति के संचालित हो रहे हैं। इसके अलावा 30 से अधिक शहरी स्थानीय निकायों में एक भी घर सीवर नेटवर्क से नहीं जुड़ा है, जिसके कारण घरेलू सीवेज सीधे खुले नालों के माध्यम से प्राकृतिक जलस्रोतों में पहुंच रहा है।
अधिकरण ने कहा कि हिमाचल प्रदेश भारत के सबसे संवेदनशील हिमालयी राज्यों में है, जहां से यमुना, सतलुज, ब्यास, रावी सहित अनेक महत्वपूर्ण नदियों का उद्गम होता है। ऐसे राज्य में बिना उपचार का सीवेज और अवैज्ञानिक कचरा प्रबंधन पर्यावरणीय दृष्टि से अत्यंत गंभीर विषय है। एनजीटी ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि सभी अस्थायी डंपिंग स्थलों को वैज्ञानिक अपशिष्ट प्रबंधन प्रणाली से जोड़ा जाए, शेष लिगेसी कचरे का समयबद्ध निस्तारण किया जाए, प्रत्येक जिले में मटेरियल रिकवरी फैसिलिटी (एमआरएफ), कंपोस्टिंग एवं बायो सीएनजी जैसी व्यवस्थाओं का विस्तार किया जाए तथा ग्रामीण क्षेत्रों के लिए चार सप्ताह के भीतर व्यापक ठोस अपशिष्ट प्रबंधन योजना तैयार की जाए।
अधिकरण ने हिमाचल प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को बिना वैध अनुमति संचालित एसटीपी की सूची प्रस्तुत करने, बकाया पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति की वसूली सुनिश्चित करने तथा लगातार मानकों का उल्लंघन करने वाले संयंत्रों के विरुद्ध जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 1974 के तहत कार्रवाई करने के निर्देश दिए हैं। एनजीटी ने सभी शहरी स्थानीय निकायों को समयबद्ध सीवर कनेक्टिविटी योजना तैयार करने, उपचारित जल के पुनः उपयोग को बढ़ावा देने, खुले में कचरा जलाने और डंपिंग पर पूर्ण रोक लगाने, स्रोत पर कचरा पृथक्करण सुनिश्चित करने, महिला स्वयं सहायता समूहों की भागीदारी बढ़ाने, सामुदायिक रेडियो और जनजागरूकता अभियानों को सुदृढ़ करने, शिकायत निवारण तंत्र विकसित करने तथा डिजिटल निगरानी प्रणाली लागू करने के भी निर्देश दिए हैं। पीठ ने सभी जिलों में वर्षा जल निकासी नालों के दोनों किनारों पर स्थानीय प्रजातियों के वृक्षारोपण, स्वतंत्र सामाजिक एवं पर्यावरणीय संस्थाओं द्वारा नियमित निगरानी एवं मूल्यांकन तथा मुख्य सचिव द्वारा समयबद्ध अनुपालन सुनिश्चित करने पर विशेष बल दिया।