प्रदेश में सत्ता के कई केंद्र बन गए हैं। हारे-नकारे लोग अपना वर्चस्व स्थापित करने के लिए अधिकारियों और कर्मचारियों पर अनुचित दबाव डाल रहे हैं। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री पूरी तरह से आरएसएस और एबीवीपी के प्रभाव में काम कर रहे हैं।
नतीजन प्रशासनिक अमला पटरी से उतर गया है। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री यह दलील दे रहे हैं कि हिमाचल प्रदेश को कर्जे की बैसाखियों से बाहर निकालना मुश्किल है और खुद सरकार अब तक लगभग 3 हजार करोड़ रुपये का कर्जा लेकर काम चला रही है।
हजारों कर्मचारियों के तबादले राजनीतिक प्रतिशोध की भावना से किए गए। नेशनल हाईवे के नाम पर भी जनता से धोखा हुआ है। शिमला में पेयजल संकट सरकार की सबसे बड़ी नाकामी है।