प्रदेश के हजारों मिड-डे मील वर्कर्स शुक्रवार को हड़ताल करेंगे। प्रारंभिक शिक्षा निदेशालय ने ग्रीष्मकालीन छुट्टियों वाले स्कूलों में बच्चों के लिए दोपहर का भोजन बनाने की वैकल्पिक व्यवस्था कर दी है। निदेशालय ने स्कूल प्रमुखों सहित जिला उपनिदेशकों और मिड-डे मील प्रभारियों को आदेश जारी कर शुक्रवार को हर हालत में भोजन का इंतजाम करने को कहा है।
मिड-डे मील वर्कर्स यूनियन ने एक दिन की हड़ताल करने का फैसला लिया है। यूनियन (संबंधित सीटू) की राज्य कमेटी का आरोप है कि केंद्र और राज्य सरकारें लगातार मिड-डे मील वर्कर्स के वेतन में बढ़ोतरी की बात करती हैं, लेकिन उसे लागू नहीं करतीं। राज्य सरकारों ने 12 साल से वेतन में एक रुपये की भी बढ़ोतरी नहीं की है। मात्र एक हजार रुपये प्रतिमाह दिया जाता है।
वह भी साल में 10 महीने का दिया जाता है। राज्य अध्यक्ष कांता महंत ने कहा कि महंगाई बढ़ रही है, लेकिन वर्कर्स के वेतन में बढ़ोतरी नहीं की गई है। यूनियन ने सरकार से जानना चाहा है कि जब विधायक और मंत्री प्रतिमाह 2 लाख 40 हजार में गुजारा नहीं कर सकते तो मिड-डे मील वर्कर्स 1000 रुपये में कैसे गुजारा करें। महिलाओं को सशक्त बनाने के वायदे करने वाली सरकार गरीब और विधवा महिलाओं को 1000 रुपये वेतन देकर उनकी गरीबी का मजाक बना रही है।
यूनियन ने मांग की कि वर्कर्स को सरकार की ओर से घोषित न्यूनतम वेतन 6000 रुपये प्रतिमाह दिया जाए। चौथे दर्जे का सरकारी कर्मचारी घोषित किया जाए। 45वें श्रम सम्मेलन की सिफारिशों को लागू किया जाए। वर्कर्स को सरकारी कर्मचारी मानना, ग्रेच्युटी और पेंशन सुविधा शामिल है। वर्कर्स को नौकरी से न हटाया जाए, प्रत्येक स्कूल में दो वर्कर्स को नियुक्त किया जाए। अतिरिक्त कार्य करवाने को अतिरिक्त वेतन दिया जाए।
नियुक्ति पत्र तथा पहचान पत्र दिए जाएं। महिला वर्कर्स के लिए 6 महीने का प्रसूति अवकाश दिया जाए। प्रतिमाह वेतन का भुगतान किया जाए। यूनियन ने वर्कर्स विरोधी नीतियों के खिलाफ प्रदेश में 50,000 पर्चे छापने का फैसला भी लिया है। पर्चे को पूरे प्रदेश के मिड-डे मील वर्कर्स में बांटा जाएगा। उधर, शुक्रवार को आंगनबाड़ी कार्यकर्ता भी हड़ताल पर रहेंगी।