पंडित सुखराम परिवार मंझधार में फंसा
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मंडी लोकसभा उपचुनाव में सुखराम परिवार मंझधार में फंस गया है। हिमाचल प्रदेश की राजनीति के फीनिक्स माने-जाते रहे पंडित सुखराम का अब पहले जैसा दमखम नहीं रहा है। उनके बेटे भाजपा विधायक अनिल शर्मा पिछले चुनाव की तरह इस बार भी घर में बैठ गए हैं। पंडित सुखराम और उनके पोते आश्रय शर्मा कांग्रेस से जुडे़ हैं, मगर उन्होंने भी प्रचार पर रुख स्पष्ट नहीं किया है। भाजपा और कांग्रेस दोनों राजनीतिक दल सुखराम फैक्टर को अनदेखा करते नजर आ रहे हैं। मंडी की सियासत में पंडित सुखराम का कभी विशेष दखल रहा है। वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में प्रतिभा सिंह भाजपा प्रत्याशी रामस्वरूप शर्मा से चुनाव हारी थीं तो वीरभद्र सिंह ने पंडित सुखराम पर चुनाव में ब्राह्मणवाद का प्रयोग करने का आरोप लगाया था।
1998 में पंडित सुखराम ने भाजपा से अलग होकर नई पार्टी हिमाचल विकास कांग्रेस बनाई थी और पांच विधायक जिताए थे। तब निर्दलीय विधायक रमेश ध्वाला के समर्थन से बनी वीरभद्र सरकार गिर गई और पहली बार भाजपा-हिविकां गठबंधन से प्रेमकुमार धूमल के नेतृत्व की सरकार बनी। वर्ष 2007 में बेटे अनिल शर्मा को कांग्रेस टिकट पर चुनावी रण में उतारा। 2012 में अनिल शर्मा दूसरी बार विधायक बने तो वीरभद्र सरकार में मंत्री बने। 2017 में अनिल शर्मा भाजपा टिकट पर चुनाव लड़े और जयराम सरकार में मंत्री बन गए। वर्ष 2019 में पंडित सुखराम और उनके पोते आश्रय शर्मा फिर कांग्रेस के हो गए।
पोते आश्रय शर्मा के लिए टिकट झटक लाने में पंडित सुखराम कामयाब हुए, मगर वह मोदी लहर में रिकॉर्ड मार्जन यानी 3 लाख 99 हजार 572 मतों से भाजपा प्रत्याशी रामस्वरूप शर्मा से हार गए। चुनाव हारने के बाद से सुखराम परिवार दोराहे पर खड़ा हो गया। अनिल शर्मा का मंत्री पद चला गया है। अब पिता और पोता कांग्रेस की नाव में सवार हैं तो बेटा भाजपा की पतवार पकड़े हुए हैं। न तो यह परिवार अपनी किश्ती की दिशा तय कर पा रहा है और न ही कांग्रेस तथा भाजपा से ही इन्हें ज्यादा तवज्जो मिल रही है।
हिविकां के रूप में तीसरा विकल्प दिया, पर अगले चुनाव में फेल हुए सुखराम
सुखराम 1984 में मंडी से कांग्रेस के सांसद बने। 1989 में महेश्वर सिंह से चुनाव हार गए। फिर 1991 में कांग्रेस के सांसद बने। इसके बाद वह केंद्रीय संचार राज्य मंत्री बने। इस बीच, दूरसंचार विभाग के एक घोटाले से उनका नाम जोड़ा गया तो वह बहुत विवादित रहे। 1996 में भी सांसद चुने गए, मगर उन्हें विवाद के बाद निष्कासित किया गया। फिर 1998 में उन्होंने हिमाचल विकास कांग्रेस के रूप में नया प्रयोग किया। वह 2003 में भी हिविकां से विधायक बने। 1998 मेें उन्होंने पांच विधायकों के साथ सरकार बनाकर तीसरे विकल्प की आशा तो जगाई, मगर अगले चुनाव में वह इस प्रयोग में असफल रहे। वर्ष 1999 में शिमला से उनकी धनीराम शांडिल को सांसद भी चुना गया। इसके बाद उनकी बनाई पार्टी भी खत्म हो गई।