गैर मान्यता प्राप्त भाषाओं में वाचिक महाकाव्य विषय को लेकर गेयटी थियेटर के मुख्य सभागार में हुई चर्चा में लेखक एम मणि मैतेई ने कहा कि उत्तर पूर्व भारत में हिंदू धर्म का प्रचार रामायण और महाभारत से ही हुआ है। भारतीय साहित्यिक विरासत को वाचिक महाकाव्य मूल्यवान बना रहे हैं। वाचिक महाकाव्य हमारी सांस्कृतिक विरासत हैं। देश में कई संस्कृतियां हैं। हर संस्कृति में अलग-अलग साहित्य है। उन्होंने कहा कि 14वीं सदी में असम में रामायण को असमी भाषा में लिखा गया था।
देश के कई हिस्सों में रामायण अलग-अलग तरीके से बताई गई है। चर्चा की अध्यक्षता करते हुए लेखक महेंद्र कुमार मिश्र ने कहा कि लिखित साहित्य को मान्यता मिलती है, लेकिन मौखिक को नहीं। उन्होंने कहा कि भारतीय साहित्य चक्रीय है। लिखित और मौखिक का चक्र समय-समय पर घूमता रहता है। तेलुगु कवि और समालोचक एस नागमल्लेश्वर राव ने कहा कि भारत भाषायी दृष्टि से सघन और वैविध्यपूर्ण है। इनमें से प्रत्येक भाषा की अपनी विशिष्टता, इतिहास और विरासत है।