वादियों का आरोप था कि प्रतिवादियों ने ऐसा करते समय उनकी सहमति नहीं ली और कार्य करते जा रहे हैं। प्रतिवादियों का कहना था कि 13 मई, 1958 को उनके दादा ने विवादित भूमि का पारिवारिक बंदोबस्त कर दिया था।
इसलिए निचली अदालतों ने वादियों का दावा खारिज कर दिया था। वादियों ने निचली अदालत के फैसलों को हाईकोर्ट में यह कहते हुए चुनौती दी कि पार्टीशन डीड पंजीकृत न होने और उस पर कोई स्टांप न होने के कारण उसे नजरअंदाज किया जाना चाहिए।
न्यायाधीश तरलोक सिंह चौहान ने निचली अदालतों के फैसलों को उचित ठहराते हुए कहा कि पारिवारिक बंदोबस्त को न तो रजिस्टर्ड करने और न ही कानून के तहत उस पर किसी स्टांप ड्यूटी की जरूरत होती है।