हिमाचल के जिला किन्नौर और लाहौल का कानून देश के कानून से अलग है। यह दोनों जिले मंडी लोकसभा क्षेत्र में आते हैं।
यहां आज भी वाजिब-उल-अर्ज राजस्व कानून लागू हैं। जहां पूरे देश में महिलाओं को पैतृक संपत्ति का अधिकार है लेकिन यहां की महिलाओं को इस 21वीं सदी में भी इस अधिकार से वंचित रखा गया है।
इन दो जनजातीय जिलों में भू राजस्व अधिनियम 1954 लागू ही नहीं है।
यहां लागू ही नहीं हो पाया कानून
बेटियों को पैतृक संपत्ति का हिस्सा दिलाना यहां का सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा है। कहने को तो जहां महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए सरकारी स्तर पर बहुत कुछ हुआ है।
पंचायत चुनाव में महिलाओं को 50 फीसदी आरक्षण दिया हुआ है। संसद में बड़ी भागीदारी के लिए कानून पास करने की तैयारी है, लेकिन अंग्रेजों से भी पुराने कानून को किन्नौर और लाहौल स्पीति की महिलाओं पर आज भी जबरन थोपा हुआ है।
इस कानून के तहत परिवार की संपत्ति बाहर के लोगों को न जाए इसलिए महिला संपत्ति का बंटवारा सिर्फ बेटों में होता है।
नेताओं ने आज तक नहीं उठाया मामला
बेटा न होने पर संपत्ति अपने आप उसके भाई के बेटों में ट्रांसफर हो जाती है। हैरत की बात है कि हम महिलाओं के तमाम आंदोलनों के बावजूद अब तक यहां के जनप्रतिनिधियों इस कानून में संशोधन की बात तक नहीं उठाई।
यह पुरुषवादी सोच का नतीजा है। उन्हें लगता है कि इससे उनका वोट बैंक प्रभावित होगा। इस बारे में कुछ महिलाएं खुद प्रदेश सरकार और राज्यपाल से भी महिलाओं को पैतृक संपत्ति दिलाने की मांग उठा चुकी हैं।
भू राजस्व अधिनियम 1954 जनजातीय क्षेत्र में लागू नहीं है। इस कारण यहां की महिलाएं खुद को असुरक्षित महसूस कर रही हैं। बाकी सभी कानून जनजातीय क्षेत्र में लागू हैं केवल भू स्वामित्व के अधिकार से महिलाओं को वंचित रखा गया है।
सरकार के कई संशोधन, मगर सब बेकार
भारत सरकार और हिमाचल सरकार ने देश प्रदेश की महिलाओं को समानता का अधिकार दिलाने के लिए कई कानूनों में संशोधन कर रखा है।
मगर अफसोस की बात यह है कि किन्नौर-लाहौल जिले की महिलाओं के साथ अभी तक भेदभाव पूर्ण व्यवहार हो रहा है।
वाजिब-उल-अर्ज में संशोधन आज के दौर में बहुत जरूरी है ताकि यहां की महिलाएं समाज में सम्मान के साथ जी सकें। हाल ही में बंदोबस्त वाजिब-उल-अर्ज तहरीर करते समय भी महिलाओं को किसी प्रकार का तवज्जो नहीं दी गई।