रोल मॉडल बन कर मासूम बेटे शाश्वत के सभी अंगदान करने वाले इंदिरा गांधी मेडिकल कॉलेज सर्जरी के प्रोफेसर डॉ. पुनीत महाजन ने उमंग फाउंडेशन के वेबिनार में अंगदान की बारीकियां समझाईं। उन्होंने कहा कि देश में हर साल चार लाख मरीज अंग प्रत्यारोपण के इंतजार में मर जाते हैं। जबकि एक ब्रेन डेड डोनर सारे अंग दान कर सीधे तौर पर आठ जानें बचा सकता है और दो दृष्टिहीन लोगों को रोशनी दे सकता है। जीवन काल में भी कुछ अंग दान किए जा सकते हैं। इस कार्यक्रम में 150 से अधिक युवाओं ने वर्चुअल माध्यम से हिस्सा लिया।
पुनीत महाजन और उनकी पत्नी डॉ. शिवानी महाजन ने पांच वर्ष पूर्व अपने 13 वर्षीय बेटे शाश्वत के पीजीआई में ब्रेन डेड घोषित होने के बाद सभी अंगदान कर कई लोगों की जिंदगियां बचाई। डॉ. पुनीत को हिमाचल प्रदेश सरकार ने स्टेट ऑर्गन एंड टिशु ट्रांसप्लांटेशन ऑर्गेनाइजेशन (सोटो) का नोडल अधिकारी भी बनाया है।
उनका कहना था कि ब्रेन डेड वह अवस्था होती है जब मस्तिष्क पूरी तरह मृत हो जाता है और उसके पुनर्जीवन की गुंजाइश खत्म हो जाती है, लेकिन उस मरीज को वेंटिलेटर से लगातार ऑक्सीजन दी जाती है ताकि उसके शरीर में खून का संचरण बना रहे। घर में या अस्पताल में किसी की मृत्यु होने पर तब तक अंगदान नहीं हो सकता जब तक कि वह वेंटिलेटर पर न हो। किसी मरीज को ब्रेन डेड घोषित करने के लिए अस्पताल में विशेषज्ञ डॉक्टरों की एक कमेटी होती है।
उन्होंने कहा कि भारत में विकसित देशों की तुलना में अंगदान का प्रतिशत नगण्य है। देश में कुल मृतकों में से 2 प्रतिशत से भी कम अंगदान के पात्र होते हैं। यहां हर दस लाख आबादी पर अंगदान का फीसदी 0.08 है। उन्होंने कहा कि आईजीएमसी शिमला में अभी तक मरीजों को चार किडनी प्रत्यारोपित हुई हैं।
अन्य अंगों के प्रत्यारोपण की सुविधा भविष्य में शुरू की जाएगी। फाउंडेशन के अध्यक्ष प्रो. अजय श्री वास्तव कहा की उमंग फाउंडेशन भविष्य में अंगदान को लेकर जागरूकता मुहिम जारी रखेगा। कार्यक्रम के संचालन में दिल्ली विश्वविद्यालय में सहायक प्रोफेसर डॉ. सुरेंद्र कुमार के अलावा विनोद योगाचार्य, संजीव कुमार शर्मा, आकांक्षा जसवाल, दीक्षा वशिष्ठ और उदय वर्मा सहयोगी रहे।