अलौकिक शक्तियों, देव परंपराओं और अनुष्ठानों के सामाजिक प्रभावों का होगा वैज्ञानिक अध्ययन
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संवाद न्यूज एजेंसी
शिमला। हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय (एचपीयू) शिमला के हिंदी विभाग में हिमाचल की सांस्कृतिक धरोहर और लोक आस्थाओं को लेकर महत्वपूर्ण शोध परियोजना शुरू की है। हिमाचल प्रदेश की सांस्कृतिक धरोहर : शांत महायज्ञ–अलौकिक शक्तियों एवं अनुष्ठानों का सामाजिक-सांस्कृतिक अध्ययन शीर्षक से संचालित यह परियोजना भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद के सहयोग से चलाई जा रही है।
परियोजना का उद्देश्य प्रदेश में प्रचलित देव संस्कृति, अलौकिक विश्वासों और अनुष्ठान परंपराओं को सामाजिक संरचना के संदर्भ में समझना है। शोध के तहत यह विश्लेषण किया जाएगा कि यह परंपराएं किस प्रकार ग्रामीण और जनजातीय समाज में सामुदायिक जीवन, सामाजिक अनुशासन तथा निर्णय प्रक्रिया को प्रभावित करती हैं। अध्ययन में फील्ड-आधारित अनुसंधान को प्रमुखता दी है। इसके तहत विभिन्न क्षेत्रों में जाकर लोक कथाओं, देव संस्थाओं और धार्मिक अनुष्ठानों का दस्तावेजीकरण किया जाएगा। परियोजना निदेशक डॉ. भवानी सिंह के नेतृत्व में संचालित इस अध्ययन में तेजी से बदलते सामाजिक और तकनीकी परिवेश में इन परंपराओं के स्वरूप में आ रहे बदलावों का मूल्यांकन भी इस परियोजना का महत्वपूर्ण हिस्सा है। शोध यह भी जांचेगा कि आधुनिक शिक्षा, शहरीकरण और नई पीढ़ी के दृष्टिकोण का लोक आस्थाओं पर क्या प्रभाव पड़ रहा है।
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शोध सहायक और फील्ड अन्वेषक होंगे तैनात
परियोजना के लिए एक रिसर्च असिस्टेंट और एक फील्ड इन्वेस्टिगेटर की नियुक्ति की जाएगी। रिसर्च असिस्टेंट के लिए सामाजिक विज्ञान में स्नातकोत्तर में न्यूनतम 55 प्रतिशत अंक अनिवार्य है जबकि फील्ड अन्वेषक के लिए सामाजिक विज्ञान में स्नातक योग्यता निर्धारित की है। रिसर्च असिस्टेंट को 10 माह के लिए 37 हजार रुपये और फील्ड अन्वेषक को 4 माह के लिए 20 हजार रुपये प्रतिमाह मानदेय मिलेगा। इच्छुक अभ्यर्थियों को 7 मई तक आवेदन जमा करना होगा। चयन साक्षात्कार के आधार पर किया जाएगा और यह नियुक्तियां अस्थायी होंगी।
फील्ड रिसर्च से मिलेगा जमीनी डेटा
परियोजना में फील्ड रिसर्च को केंद्रीय स्थान दिया है। शोध दल विभिन्न जिलों, विशेषकर दूरदराज और जनजातीय क्षेत्रों में जाकर प्रत्यक्ष अध्ययन करेगा। लोक अनुष्ठानों, देव परंपराओं और उनसे जुड़े व्यवहारों का विस्तृत प्रलेखन किया जाएगा। साक्षात्कार और सहभागी अवलोकन के जरिये समुदायों के अनुभवों और मान्यताओं को दर्ज किया जाएगा। यह प्रक्रिया न केवल पारंपरिक ज्ञान के संरक्षण में सहायक होगी बल्कि शोध को अधिक प्रामाणिक और जमीनी आधार भी प्रदान करेगी।