रेरा ने अपने आदेश में यह भी रेखांकित किया कि परियोजना का रेरा पंजीकरण केवल 4 मार्च 2027 तक वैध है, जबकि कथित नए समझौते में कब्जा देने की तिथि 31 दिसंबर 2027 निर्धारित की गई थी। प्राधिकरण ने सवाल उठाया कि जब परियोजना का पंजीकरण मार्च 2027 में समाप्त हो रहा है, तो नौ महीने बाद कब्जा देने की शर्त कैसे वैध मानी जा सकती है।
बिल्डर ने यह दलील भी दी कि खरीदार की ओर से दी गई 33.40 लाख रुपये की राशि अलग-अलग संस्थाओं यानी ब्रावो फर्नीचर्स एंड इंटीरियर्स और राजदीप एंड कंपनी हॉस्पिटैलिटी एलएलपी को दी गई थी। इसलिए मूल प्रमोटर कंपनी को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। जांच में सामने आया कि इन सभी संस्थाओं का संचालन प्रमोटर कंपनी के प्रबंध निदेशक राजदीप शर्मा से जुड़ा हुआ है। रेरा ने माना कि स्टांप ड्यूटी बचाने और वित्तीय जवाबदेही से बचने के लिए सहयोगी कंपनियों के माध्यम से धनराशि घुमाने का प्रयास किया गया, जिसे स्वीकार नहीं किया जा सकता।