हिमाचल में हर बार बस हादसों से सबक लेने का ड्रामा होता है। सरकार के नुमाइंदे और अफसरान आमूल-चूल बदलाव की बातें करते हैं। नया बस हादसा होता है तो चंद दिनों तक हो-हल्ला मचता है। सड़क-परिवहन से जुडे़ तमाम महकमों में तालमेल की कमी दिखती है।
फिर कुछ दिन में सब भुला दिया जाता है। तब तक कोई सुध नहीं लेते, जब तक किसी और बस दुर्घटना में 20 या 40 लोग मौत के घाट न उतरें। यह सिलसिला दशकों से चल रहा है। सड़क किनारे रेलिंग, पैरापिट जैसी रोक लगे तो शायद हादसे इतने न होते, मगर ये कैसे लगें।
हिमाचल के भूगोल के माप से केंद्र सरकार से हिमाचल को सड़क सुधार को बजट नहीं मिलता। राज्य की हालत इतनी खराब है कि यह अपने स्तर पर सड़कों के गड्ढे तक ठीक नहीं कर सकता। खटारा, पुरानी या जर्जर हो चुकी बसों को एकदम बदला नहीं जा सकता।
ऐसा करें तो कई रूट बंद होंगे। परिवहन व्यवस्था फिर ठप होगी। राज्य पथ परिवहन निगम की चार हजार बसें चलती हैं। हरेक सरकारी बस के साथ औसतन डेढ़ चालक मौजूद हैं। यानी दो बसों के साथ तीन ड्राइवर। उनमें भी कोई हृदयरोगी तो कई रक्तचाप, शूगर या डायबिटीज के मरीज हैं।
अनेक शराब का सेवन करने वाले भी हैं। पुलिस महकमा हर सड़क, ड्राइवर या वाहन पर पैनी नजर रखने की स्थिति में नहीं है। हिमाचल की सड़कों पर एचआरटीसी की 300 से ज्यादा खटारा या जर्जर बसें दौड़ रही हैं। तय सफर सीमा को तकरीबन 500 बसें पूरा कर चुकी हैं।
7 माह में 1700 हादसों में 375 की मौत
पिछले सात महीनों में हिमाचल में छोटे बड़े लगभग 1700 हादसे हो चुके हैं। इन्हीं में बस दुर्घटनाएं भी शुमार हैं। एक दिसंबर से लेकर अब तक इन हादसों में तकरीबन 375 लोग जान गंवा चुके हैं।
हिमाचल में पुलिस विभाग ने सड़कों पर 314 ब्लैक स्पाट चिन्हित कर रखे हैं। इन स्पाट पर परिवहन, लोक निर्माण और पुलिस विभाग के अधिकारियों की स्टेट रोड सेफ्टी काउंसिल में निरंतर चर्चाएं हो चुकी हैं। नतीजा कोई नहीं।