हिमाचल में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति वर्ग से जुड़े लोगों के साथ होने वाली आपराधिक घटनाओं की जांच अब प्राथमिकता के आधार होगी। पुलिस विभाग ने 30 दिनों के भीतर इनका निपटारा करने की समय अवधि तय की है। इनसे जुड़े मामलों की जांच ऐसे अधिकारी से होगी, जो उप पुलिस अधीक्षक के रैंक से कम नहीं होंगे।
लोगों के साथ होने वाले अपराधों की जांच और नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1955 और अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम 1989 को प्रभावी ढंग से कार्यान्वित करने के लिए एडवाइजरी जारी की है। इसमें कहा गया है कि सभी एसपी अपने जिले में अत्याचार संभावित क्षेत्रों की पहचान करें।
संवेदनशील क्षेत्रों में शांति बनाए रखने और समाज के कमजोर वर्ग की सुरक्षा के संबंध में जिला मजिस्ट्रेट के साथ मामला उठाने की बात कही गई है। ये भी स्पष्ट किया गया है कि यदि ड्यूटी पर तैनात पुलिस अधिकारी किसी वैध कारण के बगैर प्राथमिकी दर्ज करने से इंकार करता है तो ऐसे अधिकारी के खिलाफ अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति का सदस्य न हो, के विरुद्ध नियमानुसार अभियोजन चलाया जाना चाहिए।
पुलिस अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम 1989 के तहत पीड़ित महिलाओं की शिकायत दर्ज करने के लिए जांच के प्रत्येक दल में महिला पुलिस कर्मियों की तैनाती होगी। गंभीर मामलों में जिला पुलिस अधीक्षक घटनास्थल का दौरा करना होगा।
इसके साथ ही एसपी को ट्रायल कोर्ट में ऐसे मामलों की त्वरित सुनवाई के लिए पुलिस अधिकारियों और अधिकारिक गवाहों सहित अभियोजन पक्ष के सभी गवाहों की समय पर उपस्थिति और सुरक्षा सुनिश्चित करने को कहा गया है। इसी तरह कई अन्य दिशा - निर्देश भी जारी किए गए हैं।