हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि बच्चों की ओर से किया गया अपराध कितना भी गंभीर या जघन्य क्यों न हो, उसे जमानत देना एक अनिवार्य नियम है। केवल विशेष परिस्थितियों में ही उसकी जमानत रोकी जा सकती है। मामला जिला ऊना का है, जहां एक नाबालिग लड़की पर अपने साथियों के साथ मिलकर एक युवक की हत्या करने का आरोप था। पुलिस जांच में पाया गया कि लड़की और साथियों ने युवक के साथ मारपीट की, जिसका वीडियो भी सामने आया था। नाबालिग की जमानत अर्जी को पहले जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड ऊना और फिर सत्र न्यायालय ने यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि अपराध अत्यंत जघन्य प्रकृति का है और इससे समाज में रोष है। न्यायाधीश विरेंद्र सिंह की कोर्ट ने निचली अदालतों के फैसलों को पलटते हुए कहा कि जेजे एक्ट की धारा 12 में होगा अनिवार्य शब्द का इस्तेमाल किया गया है। इसका अर्थ है कि अपराध की प्रकृति गौण है। नाबालिग के मामले में अपराध की गंभीरता जमानत रोकने का आधार नहीं हो सकती। जमानत तभी रोकी जा सकती है, जब ठोस सबूत हों कि बाहर आने पर बच्चा अपराधियों के संपर्क में आएगा। निचली अदालतों ने केवल जघन्य अपराध के आधार पर जमानत रोकी, रिकॉर्ड पर ऐसा कोई सबूत नहीं था। कोर्ट ने नाबालिग याचिकाकर्ता को सशर्त जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया है, लेकिन अभिभावक को वचन देना होगा कि वह किसी अपराधी के संपर्क में नहीं आएगी। साथ ही वह पढ़ाई जारी रखे।