जिला शिमला के सरकारी स्कूलों में नौ, मंडी में 10, ऊना में 10 और बिलासपुर में 11 पद खाली हैं। प्रदेश में उर्दू में लिखा पुराना रिकॉर्ड पढ़ने वाले गिने-चुने लोग ही बचे हैं।
हिमाचल प्रदेश के सरकारी स्कूलों में उर्दू अध्यापकों के 68 पद लंबे समय से खाली हैं। उर्दू भाषा के जानकार घटने से मुस्लिम वेलफेयर सोसायटी भी चिंतित है। सोसायटी ने सरकार के दावों पर सवाल उठाए हैं। करीब एक दशक पहले सरकार ने हिमाचल प्रदेश में एक सौ चयनित स्कूलों में उर्दू विषय पढ़ाने तथा उर्दू अध्यापकों की तैनाती के आदेश दिए थे।
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हैरानी की बात है कि सरकार अभी मात्र 32 सरकारी स्कूलों में अध्यापकों की तैनाती करवा सकी है। इन स्कूलों में उर्दू विषय की पढ़ाई करवाई जा रही है। अभी 68 सरकारी स्कूलों में उर्दू भाषा के अध्यापकों के पद रिक्त हैं। जिला शिमला के सरकारी स्कूलों में नौ, मंडी में 10, ऊना में 10 और बिलासपुर में 11 पद खाली हैं। प्रदेश में उर्दू में लिखा पुराना रिकॉर्ड पढ़ने वाले गिने-चुने लोग ही बचे हैं। ऐसे में इस भाषा का वजूद खत्म होने की कगार पर है।
ऑल हिमाचल मुस्लिम वेलफेयर सोसायटी के मुख्य सलाहकार नसीम दीदान, वरिष्ठ उपाध्यक्ष वकील शकील अहमद शेख, जिला सिरमौर मुस्लिम वेलफेयर कमेटी के अध्यक्ष कैप्टन सलीम अहमद ने कहा कि उर्दू जुबान राजनीति के फेर में उलझकर दम तोड़ रही है। एक जमाने में सूबे में हिंदी के बाद उर्दू दूसरे दर्जे की भाषा थी।
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धीरे-धीरे अनदेखी के चलते उर्दू जुबान सरकारी स्कूलों से गायब हो गई। कहा कि मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर को पत्र लिखकर पूरी स्थिति से अवगत कराया गया था। आज तक इस पर कोई ध्यान नहीं दिया गया। कहा कि 68 बेरोजगारों को नौकरी मिलनी थी, वे भी इससे वंचित हैं। उन्होंने मुख्यमंत्री को दोबारा पत्र लिखकर खाली पद जल्द भरने की मांग की है।