पैसा देना तो दूर इन्हें मानदेय देगा कौन यह भी तय नहीं।
मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह ने बुधवार को कहा जब मजदूरों की दिहाड़ी बढ़ सकती है तो विधायकों का वेतन भत्ता क्यों नहीं? तर्क सही है लेकिन इसी राज्य में पांच साल से कृषक मित्र गांवों में काम कर रहे हैं लेकिन आज तक इन्हें सरकार मानदेय के नाम पर एक रुपया तक नहीं दे पाई। पैसा देना तो दूर इन्हें मानदेय देगा कौन यह भी तय नहीं। पंचायती राज विभाग इन्हें कृषि तो कृषि इन्हें पंचायती राज विभाग का बता रहे हैं।
यह भी तब जबकि कृषक मित्रों को मानदेय हिमाचल सरकार नहीं बल्कि केंद्र सरकार के आत्मा प्रोजेक्ट से मिलना है। कृषक मित्रों के लिए जो बजट तय किया गया, उसका भी कोई अता-पता नहीं। वेतन और मानदेय को लेकर राज्य में गजब विरोधाभास है। कृषि मित्रों की तैनाती दो अक्तूबर 2010 की ग्राम सभाओं में पंचायतों में की गई थी। इन्हें केंद्र सरकार की कृषि, पशुपालन आदि से जुड़ी नीतियों के प्रचार-प्रसार की जिम्मेदारी दी गई थी।
ये आज तक इस दायित्व को बिना कुछ लिए निभा रहे हैं। कृषक मित्र संगठन के नेताओं की मानें तो शुरू में उन्हें चार हजार रुपये मानदेय देने की पेशकश की गई थी मगर आज तक उन्हें एक नया पैसा नहीं मिला। उनका कहना है कि बिहार, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश, पंजाब और हरियाणा में से कुछ राज्यों में कृषक मित्रों को छह हजार रुपये मानदेय मिल रहा है।
भारतीय मजदूर कांग्रेस (इंटक) में कृषि मित्र संगठन का प्रभार देख रहे राज्य उपाध्यक्ष सोहन वर्मा ने कहा कि उन्हें हाल ही में निदेशालय से बताया गया है कि कृषक मित्रों का मामला न्यायालय में है इसीलिए कृषि विभाग इसमें कोई फैसला नहीं ले पाएगा। वर्मा ने कहा कि इस बारे में सीएम वीरभद्र सिंह का रुख सकारात्मक हैं मगर अफसरशाही इस बारे में कोई ध्यान नहीं दे रही है।
पंचायती राज विभाग के संयुक्त निदेशक केवल शर्मा ने कहा कि ग्रामसभाओं से तो कृषक मित्रों की केवल तैनातियां की गई थीं, लेकिन ये कृषि विभाग की नीतियों पर ही कार्यरत हैं। कृषि विभाग के निदेशक डॉ. सोमराज कालिया ने कहा कि ये कृषि विभाग नहीं बल्कि पंचायती राज विभाग ने तैनात किए हैं। उन्होंने कहा कि ये कोर्ट चले गए हैं इसीलिए कुछ कहना ठीक नहीं।
कर्मचारियों की पेंशन बंद तो विधायकों की क्यों नहीं
लोगों का कहना है कि वर्ष 2003 से लागू नियमों के मुताबिक सरकारी कर्मचारियों की पेंशन को बंद किया गया है तो विधायकों को पेंशन क्यों दी जा रही है।
वर्ष 2003 से लागू नियमों के मुताबिक सरकारी कर्मचारियों की पेंशन को बंद किया गया है तो विधायकों को पेंशन क्यों दी जा रही है। प्रदेश में आम लोगों और नेताओं के लिए ये अलग-अलग नियम क्यों हैं। ये सवाल प्रदेश भर से मिल रही विभिन्न प्रतिक्रियाओं में आम लोगों की ओर से उठाए जा रहे हैं।
हिमाचल में सरकारी कर्मचारियों के लिए पेंशन के दो नियम हैं। 14 मई 2003 से पहले भर्ती किए गए कर्मचारियों को सेवानिवृत्ति के बाद पेंशन है, जबकि 15 मई 2003 के बाद नियुक्त कर्मचारियों को अपने वेतन और महंगाई भत्ते का 10 प्रतिशत अंशदान कंपेनसेटरी पेंशन फंड (सीपीएफ) में कटवाना होता है। हिमाचल में विधायकों के लिए ऐसा कोई नियम नहीं है।
तमाम प्रतिष्ठानों के लिए एक और नियम ये है कि अगर कोई भी प्रतिष्ठान 20 से अधिक कर्मचारियों को दिहाड़ी पर रखता है तो उनका ईपीएफ नंबर लेकर इसे जमा करवाना होता है। ऐसे कर्मचारी दस साल बाद पेंशन के हकदार हो जाते हैं। राज्य सरकार ने हजारों अनुबंध कर्मियों को नौकरी पर तैनात किया है। ये भर्ती और पदोन्नति नियमों के तहत भर्ती किए गए हैं।
इनका हिमाचल सरकार कोई भी पेंशन अंशदान नहीं देती है। पांच या साढ़े पांच साल बाद ये नियमित हो जाते हैं। अनुबंध पर कई कर्मचारियों को बैच वाइज भर्ती किया जाता है। कई ऐसे लोग 50 साल की उम्र के बाद भी भर्ती होते हैं। इनमें से कई लोग या तो रेगुलर ही नहीं हो पाते हैं या बिना पेंशन रिटायर हो जाते हैं।
जनता के मन की बात
लोगों का कहना है कि उनका लोकतंत्र से विश्वास उठता जा रहा है।
विधायक खुद के वेतन-भत्ते ध्वनि मत से पारित करते हैं और कर्मचारियों का वेतन बढ़ाना हो तो शोर मचाते हैं। यह दुखद है। - महेश शर्मा, बिलासपुर
अध्यापक नियुक्त करने के लिए सरकार के पास पैसे नहीं हैं। अगर कर्ज का बोझ है तो अपना वेतन क्यों बढ़ाया? - शकील मोहम्मद, ऊना
अपना वेतन बढ़ा लिया, लेकिन जिसके वेतन को बढ़ाना था, उसका नहीं बढ़ाया। सरकार सिर्फ अपने हित साध रही है। - अमर भंडारी, शिमला
वेतन बढ़ा लिया तो होटल, खाना, बिजली तथा अन्य सब्सिडी बंद हो। - अनिल ठाकुर, बिलासपुर
लोकतंत्र से विश्वास उठता जा रहा है। देश को पढ़े-लिखे और जनता के लिए काम करने वालों की जरूरत है। - वीएम शर्मा, हमीरपुर
सीएम साहब, मजदूर और कर्मचारियों को पेंशन नहीं मिलती जो विधायकों को मिल रही हैं। ये लोकतंत्र का मजाक है। - विजय कुमार, शिमला
वेतन बढ़ाना बुरी बात नहीं है लेकिन काम तो करो। कहीं ये राजा साहब का चुनावी जुमला तो नहीं है। - खेचोक जैंगपो, लाहौल स्पीति
विधायकों और मंत्रियों को अपने वेतन बढ़ाने में संकोच क्यों नहीं हुआ। अब ये खुद अपने वेतन बिल को खारिज करें। - तेंजिन देकिड, कुल्लू
प्रदेश सरकार को नो वर्क नो पे वाली पॉलिसी अपनानी चाहिए तभी देश और प्रदेश तरक्की करेगा। - राकेश कुमार
जो सेवा करना चाहता है उसे मौका नहीं मिलता और जिसको मंच मिलता है वो सेवा भाव नहीं रखता। - नागेंद्र गुप्ता, टुटू
पक्ष और विपक्ष दोनों बेशर्मी से कहते हैं कि वेतन बढ़ाना जरूरी था। अगर ये जरूरी है तो आम जन की समस्याएं सुलझाना क्यों जरूरी नहीं। - निखिलेश ठाकुर, सुंदरनगर
खाली दिमाग वालों के वेतन बढ़ रहे हैं और पढ़ाई कर कुछ कर गुजरने की कोशिश करने वालों को कुछ भी नहीं। इनसे भगवान ही बचाए। - अजय शर्मा, समरहिल, शिमला
मुख्यमंत्री विधायकों की सैलरी की मजदूरों से तुलना कर रहे हैं। उनकी दस रुपये बढ़ती है और इनकी एक लाख। - संजीव कुमार, शिमला
प्रदेश का पैसा अगर आप इस तरह लुटाएंगे तो वो दिन दूर नहीं जब हर हिमाचली कंगाल और उधार के बोझ से दबा होगा। - जितेंद्र कुमार, मंडी
धूमल और सीएम ने सही कहा, ये सब बेचारे बहुत गरीब हैं। ये ऐसे गरीब जिनके पास ऑडी और फार्च्यूनर है। - किरन, कांगड़ा
कोई नेता खुद तो कभी पैसे खर्च करता नहीं है, इनकी सैलरी क्यों बढ़ाई ये समझ से परे है।
- अजित शर्मा, हमीरपुर
यह बेहद शर्मनाक बात है, कोई कमेटी होनी चाहिए जो इनकी सैलरी फिक्स करे।
- पंकज कुमार, हमीरपुर
वीरभद्र सिंह और धूमल का बयान अशोभनीय हैं। दोनों दल इस पर साथ साथ हैं।
- सूरज शर्मा, धर्मशाला
वेतन बढ़ाने की बजाय काश ये लोग प्रदेश की भलाई के लिए इकट्ठे हो जाते तो प्रदेश कहां से कहां पहुंच जाता। - सतीश गुप्ता, बालूगंज
नेताजी, मिड डे मील कर्मी 1000 और आंगनबाड़ी कार्यकर्ता 1900 रुपये मानदेय में परिवार चला रहे हैं। - नितीश पुरोहित, सरकाघाट
नेताओं को हिमाचल के युवाओं के बारे में सोचना चाहिए। नेताओं के ऐसे रवैये से आम आदमी की मुश्किलें बढ़ेंगी। - अजय, कांगड़ा