हींग का पौधा शुष्क ठंडी मरु भूमि में पैदा होता है, जो मुख्यतया ईरान, तुर्की, कजाकिस्तान, रूस, सीरिया और अफगानिस्तान के ठंडे क्षेत्रों में उगती है। भारत हींग के लिए पूरी तरह इन्हीं देशों पर निर्भर है।
इसे आयात करने के लिए कई हजार करोड़ खर्च करता है। हींग का प्रथम बीज भारत में मंगवाने वाले वाणिज्यिक फसलों पर पिछले 17 वर्षों से शोध में लगे डॉ. विक्रम शर्मा ने बताया कि हींग के लिए हमारे देश में पर्वतीय क्षेत्रों में हिमालयी क्षेत्र अति उपयुक्त हैं।
डॉ. विक्रम शर्मा प्रदेश में कॉफी के पौधों के सफल परीक्षण और प्रसार के लिए भी जाने जाते हैं। वे इस समय केंद्रीय कॉफी बोर्ड, केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के निदेशक भी हैं।
उन्होंने पिछले वर्ष मुश्किल से हींग का बीज ईरान से हासिल किया था। इसके बाद तुर्की और अफगानिस्तान से भी बीज हासिल किया। इसे प्रायोगिक तौर पर लगाने को केंद्र और प्रदेश सरकार से आग्रह कर रहे थे।
पिछले दिनों उन्हें मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने बुलाया था। कृषि और जनजातीय विकास मंत्री डॉ. रामलाल मारकंडा ने लाहौल-स्पीति में हींग का प्रथम परीक्षण करने में पूरा सहयोग किया।
प्रायोगिक तौर पर हींग के बीज स्थानीय लोगों और कृषि विश्वविद्यालय पालमपुर के कृषि विज्ञान केंद्र उदयपुर जिला लाहौल-स्पीति में दिए गए। उन्होंने मंडी क्षेत्र के जंजैहली तथा ऊपरी पहाड़ी क्षेत्र, चंबा के तीसा, किन्नौर के ऊपरी क्षेत्र को भी चुना हुआ है।
हींग के लिए उत्तराखंड के ऊपरी शुष्क ठंडे क्षेत्र, अरुणाचल प्रदेश के ऊपरी भाग भी उपयुक्त हैं। पिछले दिनों इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन बायो टेक्नालॉजी पालमपुर ने भी उनसे परीक्षण के लिए बीज मांगा था। जो करीब 200 ग्राम डायरेक्टर डा. संजय कुमार और उनकी टीम को सौंप दिया था।
डॉ. शर्मा ने बताया कि हींग गाजर प्रजाति का एक छोटा सा पौधा है, जिसकी आयु पांच वर्ष है। एक पौधा करीब आधा लीटर से एक लीटर तक हींग का दूध पैदा कर देता है। इसका बाजार में मूल्य 12 से 35 हजार तक है। बाजार में मिलने वाली हींग अशुद्धियों से भरपूर होती है।
इसमें आटा और अन्य अशुद्धियां डाल कर बनाया जाता है। इसमें 80 से 95 प्रतिशत तक आटा मिला कर बाजार में बेचा जाता है। अभी तक हींग का देश में कभी भी किसी शोध संस्थान ने कोई ट्रायल नहीं किया। न ही बीज उपलब्ध हो पाया।