हाईकोर्ट ने प्लास्टिक बैग पर सरकार की ओर से लगाए प्रतिबंध के बावजूद धड़ल्ले से इसके प्रयोग की शिकायत पर कड़ा संज्ञान लिया है। मुख्य न्यायाधीश मंसूर अहमद मीर और न्यायाधीश संदीप शर्मा की खंडपीठ ने मामले में मुख्य सचिव, गृह सचिव और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के सदस्य सचिव से स्टेटस रिपोर्ट तलब की है।
कुल्लू के तपेश चोपड़ा ने हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के नाम प्लास्टिक के उत्पादन और उपयोग की शिकायत पत्र के माध्यम से की है। पत्र पर हाईकोर्ट ने स्वत: संज्ञान लिया। आरोपों के अनुसार प्लास्टिक बैगों के उपयोग पर सरकार ने पूर्णतया प्रतिबंध लगा रखा है, मगर प्रदेश में इसका उत्पादन और उपयोग धड़ल्ले से हो रहा है।
कोई भी सक्षम अधिकारी इसे रोकने को इच्छुक नजर नहीं आता। इनके उत्पादन में बैटरियों के कचरे का इस्तेमाल किया जाता है। यह न केवल वातावरण को दूषित करता है, अपितु इससे मानव जीवन पर भी विपरीत असर पड़ रहा है। प्रार्थी ने प्रदेश में प्लास्टिक बैन पर बने कानून व कोर्ट के आदेशों की अक्षरश: अनुपालना करने के लिए सरकार को जरूरी निर्देश देने की गुहार लगाई है।
बेलदार को बर्खास्तगी की तारीख से दो वरिष्ठता
हिमाचल हाईकोर्ट
हाईकोर्ट ने बेलदार को उसकी बर्खास्तगी की तारीख से वरिष्ठता देने के आदेश दिए हैं। न्यायाधीश तरलोक सिंह चौहान ने श्रम न्यायालय के फैसले को गलत ठहराया। इसमें विद्युत बोर्ड में कार्यरत प्रार्थी टेक सिंह को उसकी बर्खास्तगी के बाद श्रम अधिकारी को दिए डिमांड नोटिस की तारीख से सीनियोरिटी देने के आदेश दिए थे।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि प्रार्थी को गलत ढंग से वर्ष 31 मई, 1998 में बर्खास्त किया था। उसने समय पर प्रशासनिक प्राधिकरण में टर्मिनेशन के खिलाफ मामला दायर किया था। जब मामला दायर किया गया, उस समय ऐसे मामलों का क्षेत्राधिकार प्रशासनिक प्राधिकरण के समक्ष था। प्रदेश एग्रो इंडस्ट्रीज कॉर्पोरेशन लिमिटेड बनाम राजकुमार के फैसले के अनुसार बेलदार से संबंधित टर्मिनेशन के मामलों में प्रशासनिक प्राधिकरण का क्षेत्राधिकार खत्म हो गया।
प्रशासनिक प्राधिकरण ने प्रार्थी के मामले का निपटारा इस शर्त के साथ किया कि वह सक्षम न्यायालय के समक्ष मामला उठाए। 9 जनवरी, 2006 को मामले का निपटारा होने के बाद प्रार्थी ने श्रम अधिकारी के समक्ष डिमांड नोटिस दायर किया। श्रम विभाग ने मामला श्रम न्यायालय को रेफर किया। श्रम न्यायालय ने प्रार्थी के टर्मिनेशन ऑर्डर को रद्द कर दिया। डिमांड नोटिस की तारीख से सीनियोरिटी देने के आदेश दिए।
फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में दायर याचिका में हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि प्रार्थी को टर्मिनेशन की तारीख से सीनियोरिटी देने से वंचित नहीं किया जा सकता। प्रार्थी के अधिवक्ता ने उस समय प्रशासनिक प्राधिकरण में मामला दायर किया था, जब मामला दायर करने की तारीख को श्रमिक की टर्मिनेशन संबंधित मामले सुनने का क्षेत्राधिकारी था।
टेंडर प्रक्रिया को चुनौती देने वाली याचिका खारिज
हाईकोर्ट
हाईकोर्ट ने आईजीएमसी शिमला में लॉन्ड्री सेवा के लिए हुए टेंडर प्रक्रिया को चुनौती देने वाली याचिका को 50 हजार रुपये की कॉस्ट के साथ खारिज कर दिया। मुख्य न्यायाधीश मंसूर अहमद मीर और न्यायाधीश तरलोक सिंह चौहान की खंडपीठ ने दिल्ली की कंपनी स्कैन ग्राफिक्स प्राइवेट लिमिटेड की याचिका को खारिज करते हुए यह स्पष्ट किया कि यह याचिका न केवल फर्जी है बल्कि इसके कारण न्यायालय का कीमती समय बर्बाद हुआ है।
प्रार्थी कंपनी ने टेंडर प्रक्रिया में भाग लेने वाले प्रदेश के वरिष्ठ अधिकारियों पर अनचाहे और तर्कहीन आरोप लगाकर उनकी छवि को धूमिल करने की कोशिश की। इस तरह के प्रयास को बढ़ावा नहीं दिया जाए, इस कारण कोर्ट को मजबूरन कॉस्ट सहित याचिका खारिज करनी पड़ी। याचिका में दिए तथ्यों के अनुसार नवंबर 2015 में लॉन्ड्री सेवा 5 वर्षों के लिए मुहैया करवाने के लिए निविदा आमंत्रित की गई थी।
4 कंपनियों ने तकनीकी बिड के दौरान निविदा की अगली प्रक्रिया के लिए सफलता हासिल कर ली। इसके बाद वित्तीय बिड के लिए सफल कंपनियों को 11 जनवरी 2016 को दोपहर 4 बजे आईजीएमसी के प्रिंसिपल व आरकेएस अध्यक्ष के कार्यालय में बुलाया गया था। मगर प्रार्थी तय समय पर वित्तीय बिड के लिए हाजिर नहीं हुआ जिस कारण वित्तीय बिड उसकी गैरहाजिरी में खोलनी पड़ी।
प्रार्थी के अनुसार वित्तीय बिड उसकी गैरहाजिरी में खोली गई, ताकि ए बी इंटरप्राइजेज कंपनी को टेंडर दिया जाए। प्रार्थी का यह भी आरोप था कि टेंडर प्रक्रिया में भाग लेने वाले अधिकारियों ने टेंडर पाने वाली कंपनी को फायदा पहुंचाने के लिए दुर्भावना से कार्य किया। कोर्ट ने इन दलीलों को झूठा पाया और कॉस्ट सहित याचिका खारिज कर दी।