अमर उजाला द्वारा आयोजित मेधावी सम्मान समारोह के दौरान राज्यपाल ने मानवीय मूल्यों में गिरावट पर चिंता जाहिर करते हुए चिड़िया और बंदर की कहानी सुनाई। बताया कि एक जंगल में पेड़ के नीचे एक मजदूर अपनी झोपड़ी में रहता था। एक दिन बंदर ने उस झोपड़ी में जानकर आग लगा दी।
जंगल में रहने वाली एक चिड़िया ने पहले तो बंदर से आग बुझाने में मदद मांगी। लेकिन जब उसने मदद देने से इंकार कर दिया तो वह खुद पास की एक झील से अपनी चोंच में पानी भरकर लाती और आग की लपटों पर डालती। चिड़िया ऐसे ही करती रही, तभी बंदर ने उसे टोकते हुए कहा कि ऐसा करने से आग नहीं बुझेगी।
इस पर चिड़िया ने कहा कि इतिहास में जब कभी यह घटना दर्ज होगी तो उसमें मेरा नाम आग बुझाने वालों में दर्ज होगा और तुम्हारा आग लगाने वालों में होगा। कहानी के अंत में उन्होंने बच्चों से कहा कि हम कितने ही बड़े क्यों न बन जाए, अफसर कलेक्टर या अधिवक्ता बन जाए लेकिन अगर मानवीय मूल्य नहीं है तो जीवन बेकार है। उन्होंने शिक्षकों से भी छात्रों को नैतिक मूल्यों की शिक्षा प्रदान करने को कहा ताकि वे राष्ट्र के सम्मान जनक नागरिक बन सके।
बंदर धूर्त हैं, महावीर के वंशज नहीं
कहानी सुनाने के दौरान हिमाचल में बड़ी समस्या बन चुके बंदरों को लेकर राज्यपाल ने बड़ी बात बोली। कहा कि लोग बंदर को महावीर हनुमान का वंशज बताते हैं जबकि ये बंदर धूर्त होते हैं। कहा कि हनुमान अपना सबकुछ त्यागकर भगवान राम की सेवा में लग गए थे
लेकिन कोई बताए कि कब किसी बंदर ने किसी की सेवा की। कहा कि हनुमान वेदों के ज्ञाता थे और उनका व्याकरण पर काफी कमांड था लेकिन कभी किसी बंदर ने वेद सुनाया हो तो बताएं। कहा कि इसे धूर्त जानवर मानकर ही इसकी समस्या से निपटना चाहिए।