देवता आजीमल नारायण का वैसे करड़ू शैली का रथ है, लेकिन दशहरा में यह रथ नहीं आता है। दशहरा के लिए देवता के निशान आते हैं। देवता के निशान में घंटी और धड़छ प्रमुख होते हैं। देवता के कारकून सात दिन तक ब्यास नदी के पार डोभी में देवता आजीमल नारायण की परंपरा को निभाते हैं। देवता ब्यास को पार नहीं करते हैं, इसलिए नदी के उस पार से ही दशहरा में शामिल होते हैं।
देवता के पुजारी धर्म चंद ने कहा कि देवता की लोगों में गहरी आस्था है। देवता आजीमल नारायण के पास देवताओं का लेखा -जोखा रहता है, जिसके चलते इन्हें देवताओं का कायथ माना जाता है। मलाणा के देवता जमलू, जाणा के देवता जीव नारायण, सौर के देवता सरवल नाग, तांदला के देवता शुक्ली नाग के साथ देवता आजीमल नारायण डोभी में ही बैठते हैं। सदियों से इन देवताओं के साथ आजीमल नारायण डोभी में आकर दशहरा की परंपरा को निभा रहे हैं।
रघुनाथ के रथ से कोई राखी न तोड़े, पुलिस का लगाया पहरा
भगवान रघुनाथ के रथ के पास कोई हाथ की मौली और राखी न तोड़े, इसके लिए रथ के पास पुलिस का पहरा लगा दिया गया है। दो पुलिस कर्मी यहां तैनात किए गए हैं। यहां पोस्टर भी लगाए गए हैं। लोग दो-तीन दिन से दशहरा में हाथों की डोरी और राखी रथ के पास तोड़कर फेंक रहे थे। शाम तक डोरी और राखी के ढेर लग रहे थे, जिन्हें भगवान रघुनाथ के सेवकों को प्रतिदिन हटाना पड़ता था। बताया जा रहा है कि कुछ साल पहले यह परंपरा नहीं थी। एक-दूसरे की देखादेखी में यह प्रचलन बढ़ गया। अब दशहरा में रघुनाथ के रथ के पास हाथ की राखी और डोरी तोड़ने की होड़ मच रही थी।
ढक कर रखा जाता है रथ : देवसमाज से जुड़े लोगों के अनुसार हाथ की डोरी और राखी तोड़ने से रघुनाथ के रथ की अशुद्धता हो रही थी। इसलिए यहां पर पुलिस का पहरा और पोस्टर चिपकाने लगाने का फैसला लिया गया। भगवान रघुनाथ के रथ को ढक कर रखा जाता है। दशहरा के पहले और आखिरी दिन ही रथ के पर्दे हटाए जाते हैं। भगवान रघुनाथ के कारदार दानवेंद्र सिंह का कहना है कि लोगों से अपील की गई है कि वह रथ के ऊपर राखी और डोरी न चढ़ाएं।