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Shimla News: 5-जी का रिचार्ज करवाकर, टू-जी का दिया सिग्नल, कंपनी पर लगाया जुर्माना

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जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग शिमला ने सुनाया फैसला, रिचार्ज राशि भी करनी होगी वापस
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कंपनी ने मोबाइल खराब होने का दिया था तर्क
रुचि सांख्यान
शिमला। राजधानी शिमला के लक्कड़ बाजार के एक उपभोक्ता से पैसे लेने के बावजूद सही इंटरनेट सेवा न देना और तकनीकी बहाने बनाना एयरटेल कंपनी को भारी पड़ गया।
जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग शिमला ने सेवा में कोताही और अनुचित व्यापार-व्यवहार का दोषी पाते हुए एयरटेल कंपनी को उपभोक्ता की रिचार्ज राशि 592.32 रुपये वापस करने के साथ मानसिक उत्पीड़न और अदालती खर्च के लिए 5000 रुपये मुआवजा देने के आदेश जारी किए हैं। लक्कड़ बाजार निवासी अरुण जरियाल ने आयोग में शिकायत दर्ज करवाई थी कि उनके एयरटेल पोस्टपेड नंबर पर 22 जून 2024 से इंटरनेट सेवा सही से काम नहीं कर रही थी। इसके बाद उन्होंने 25 जुलाई 2024 को अपने नंबर को प्रीपेड में बदला और 5-जी इंटरनेट सेवा के लिए 592.32 रुपये का रिचार्ज करवाया था। इसके बावजूद उनके फोन में 5-जी की जगह लगातार 2-जी स्पीड का सिग्नल ही दिखाता रहा। कंपनी के कस्टमर केयर और ईमेल पर बार-बार शिकायत करने के बाद भी जब समस्या का समाधान नहीं हुआ तो उपभोक्ता ने कानूनी नोटिस भेजने के बाद जिला उपभोक्ता आयोग का दरवाजा खटखटाया।
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अदालत में कंपनी ने अपने बचाव में तर्क दिया कि शिकायतकर्ता रेडमी नोट 9 प्रो मैक्स हैंडसेट का इस्तेमाल कर रहे थे जो कि केवल 4-जी सपोर्ट करता है। कंपनी का कहना था कि उपभोक्ता के फोन का हार्डवेयर 5-जी के अनुकूल नहीं था इसलिए उन्हें 5-जी सेवा मिलना तकनीकी रूप से असंभव था। कंपनी ने दावा किया कि उनके नेटवर्क में कोई कमी नहीं थी और खराबी उपभोक्ता के फोन में ही थी।
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आयोग की टिप्पणी तो वापस कर देते पैसे
आयोग के अध्यक्ष डॉ. बलदेव सिंह और सदस्य निधि शर्मा की पीठ ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद कंपनी के दावों को खारिज कर दिया। आयोग ने अपने आदेश में कहा कि यदि कंपनी को जानकारी थी कि उपभोक्ता का हैंडसेट 5-जी के अनुकूल नहीं है तो उन्हें 592.32 रुपये का 5-जी रिचार्ज करने की अनुमति ही नहीं देनी चाहिए थी। यदि रिचार्ज हो भी गया था तो शिकायत मिलने पर कंपनी को वह राशि वापस कर देनी चाहिए थी। उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम को एक जन कल्याणकारी कानून बताते हुए आयोग ने कहा कि जहां दो विचार सामने आते हैं वहां उपभोक्ता के हितों की रक्षा करने वाले पक्ष को प्राथमिकता दी जाती है।
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